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सोमवार, 28 मई 2012

वीर सावरकर के जन्मदिवस पर - श्रद्धा सुमन

स्वातन्त्र्य वीर  विनायक दामोदर सावरकर के जन्मदिवस पर उनके व्यक्तित्व के विशिष्ट पहलुओं को याद कर हम उन्हें श्रद्धांजली अर्पित कर रहे हैं |  २८ मई १८८३ को महाराष्ट्र के नासिक ज़िले के अंतर्गत आने वाले, छोटे से गाँव भगूर में जन्मे , बड़ी सोच वाले सावरकर को, देशप्रेम को भयानक अपराध मानने वाली ब्रिटिश सरकार नें ४जुलाई १९११ में दोहरे आजीवन कारावास की सज़ा देकर अंडमान की सेल्युलर जेल भेज दिया था |सत्ताईस वर्ष के इस नौजवान का गुनाह था ; क्रांतिकारी मदन लाल ढींगरा के कार्यों का विरोध ना करना | अपने देश की रक्षा के लिए जर्मनी के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध करने वाली ब्रिटिश सरकार भारत वासियों के दमन के ख़िलाफ़ शस्त्र उठाने वाले भारतीयों को मौत की सज़ा सुना कर शेष भारतीयों से ढींगरा की निंदा जो सुनना चाहती थी | पूर्ण स्वराज्य को लक्ष्य बना कर  अपना जीवन देश को अर्पित करने का संकल्प लेने वाले इस वीर को परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद भी फर्ग्युसन कॉलेज ,पुणे से डिग्री नहीं मिली | कारण ? बाल गंगाधर तिलक  को अपना गुरू मानने वाले , गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव तथा  राष्ट्रीयता के भावों को जगाने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों का  आयोजन करने वाले साहसी युवा नें कॉलेज में "अभिनव भारत सोसाईटी" बना कर देशभक्ति को दिशा देने का प्रयास किया | लन्दन में बैरिस्टर बनने गए सावरकर नें  "फ्री इण्डिया सोसाइटी" बनाई| राजा के प्रति वफ़ादारी की शपथ लेने से इनकार करने के कारण बार कौंसिल और प्रैक्टिस - दोनों से हाथ धो लिया | 
देशप्रेम की आग अपने भीतर लेकर ,स्वयं जल कर दूसरों को प्रकाश और जीवन की सही राह दिखने वाले इस सूर्य नें पहली बार अंग्रेज़ों के फैलाए हुए झूठ को तब चुनौती दी थी जब १९०९ में प्रतिबंधित होने से छह महीने पहले ही उनकी पुस्तक "इंडियन वॉर ऑफ इंडीपेंडेंस -१८५७" को ज़ब्त कर लिया गया | अंग्रेज़ जानते थे जिसे वे 'सिपाहियों के राजसत्ता के प्रति विद्रोह ' कहकर प्रचारित कर रहे हैं वो देशभक्तों का प्रथम स्वातन्त्र्य युद्ध है | सावरकर जी ने अच्छी तरह शोध के जिस सत्य का उद्घाटन किया था उसे नकारना ब्रिटिश सरकार के लिए नामुमकिन रहा था , ये बात और है कि जाने किस स्वार्थ या पूर्वाग्रह के कारण ? आज़ादी के बाद जन्मी नई
भारतीय पीढ़ी को पढाई जाने वाली पुस्तकों में अंग्रेज़ों का  झूठ ही परोसा गया ! ! और - - भारतीयों का पहला गौरवपूर्ण स्वतन्त्रता संग्राम  आज़ाद भारत में विद्रोह बन गया !!
        सन१९३० में गणेश  उत्सव को सभी  जाति -धर्म -संप्रदायों का उत्सव बनाने की पहल करने वाले ,सभी देशवासियों को एक ही माँ की सन्तान मानकर २२ फरवरी १९३१ में पतित पावन मन्दिर में सभी के प्रवेश को स्वीकृति दिलवाने वाले भारत माता के इस सपूत नें ही पहला भारतीय ध्वज बनाया जिसे देशभक्ति से ओतप्रोत " मैडम भीकाजी कामा " नें जर्मनी की अन्तर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में फहराया था |
   कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता, सुसंस्कृत लेखक , प्रभावी वक्ता और प्राण हथेली पर लेकर चलने वाले देशप्रेमी वीर सावरकर के चरणों में  श्रद्धा सुमन अर्पित करते समय आज बरबस ही अमर क्रांतिकारी अशफ़ाक उल्ला की  लिखी गई पंक्तियाँ याद आ रही हैं :------
              जिसे फ़ना वे समझ रहे हैं, बका का है राज़ उसी में मुजमिर |
                  नहीं मिटाए से मिट सकेंगे , वे  लाख हमको मिटा रहे हैं  ||


1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

yes.due to their (politicians) selfish motives, our all PATRIOTIC HEROES are not getting their due status & respect . excellent work done by you .thanx for enlightenment. zuber ,moohamadpura.