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गुरुवार, 28 जून 2012

ग्राउज़ माउन्टेन की मधुर -मदिर स्मृतियाँ


यादों के झरोखों को खोलते  ही हमारे पास न जाने कहाँ से अलादीन का जादुई कालीन आ जाता है और हम उस पर सवार  होकर झरोखे की राह उन रास्तों पर आ जाते हैं जिन पर कुछ बरस पहले चलकर गये थे ।स्मृतियाँ समय की सीमाओं में कहाँ बंधती हैं । आज के दिन ,आज से ठीक चार वर्ष पहले (28जून 2008) केनेडा के सुन्दरतम प्रांत वेनकुवर की पर्वत श्रृंखलाओं और हरियाली से साफ़ -सुथरी सड़कों पर हमारी कार सरपट भाग रही थी । कार चलाने की ज़िम्मेदारी हमेशा की तरह हमारी बिटिया भारती पर ही थी । हमारा सफ़र आनन्द से भरा था क्योंकि हम चारों  (पति-अनिलजी,पुत्र-आशुतोष,पुत्रवधू-भारती और मैं ) परिवार की परम्परा के अनुसार , प्रकृति के सौन्दर्य और अन्त्याक्षरी का मज़ा एक साथ उठा रहे थे ।हाई-वे ,केनेडा-वे हम ग्राउज़ माउन्टेन की तलहटी में पहुँच गए । कार-पार्किंग में गाड़ी खड़ी करने के बाद हम चारों उस जगह आए जिस जगह से पर्वत शिखर पर पहुंचने के लिए गोंडोला में सवार  होना था ।लगभग पैंतालीस लोगों को लेकर गोंडोला ऊपर की ओर  बढ़ा तो उसके बड़े -बड़े  शीशों से नीचे के दृश्यों को देखना उतना ही रोमांचकारी लग रहा था जितना पांचवी कक्षा में पहली बार ग्लाईडर में बैठ कर दिल्ली में अपने स्कूल के ऊपर से उड़ते समय लगा था ।पहले पार्किंग क्षेत्र पीछे छूटा फिर कैपिलेनो नदी का विशाल विस्तार संकरी धारा  में बदला । नदी के आसपास की बस्तियाँ , चिनार (मैपल ) ,कैल ,देवदार से ढके पहाड़ों पर बिछी बर्फ़ -सभी को भी पीछे छोड़कर  हम ग्राउज़ पर्वतों पर पहुँच गए । लगभग 4100 फुट की ऊँचाई वाले पर्वत के आधार स्थल का नज़ारा विस्मय विमुग्ध करने वाला था । प्रकृति के उस महान सम्पूर्ण सौन्दर्य के सामने हम अवाक खड़े थे। स्थान -स्थान पर बर्फ़ जमी हुई थी परन्तु आकाश में चमकते सूर्य के ताप ने तापमान पच्चीस डिग्री पहुंचा दिया था । बर्फ़  की शीतलता वातावरण की गर्मी में बहुत सुखद लग रही थी । जमी हुई नदी पर चलना , फिसलना ,बैठना और एक दूसरे पर बर्फ़ के गोले उछालना - ऐसा लग रहा था जैसे  हम चारों के बचपन का उल्लास लौट आया है ।
प्रकृति सब स्थानों पर हमें हमारी अपनी स्मृतियों और संपर्कों से जोड़ देती है ,वो देशों  ,महाद्वीपों  की सीमाओं को कहाँ मानती है ? तभी तो ग्राउज़ पर्वत पर मुझे अपनी गंगोत्री -गंगा ,( हिमाचल प्रदेश) कोटगढ़ के दलान गांव का अपना घर , थानेधार से घर आते समय बीच में  पड़ने वाला कैल- देवदार से घिरे मन्दिर वाला प्रदेश वहां के रास्ते -कितना कुछ याद आ गया ।एक छोर से दूसरे  छोर तक नज़र दौडाने पर हिम-मंडित पर्वत श्रृंखलाओं के ऊपर चमकता नीला आकाश दिखाई दे रहा था और तलहटी में बहता नदी का जल भी अपने नीले रंग से धरा पर गगन के बिछने का बिम्ब बना रहा था ।प्रकृति का आलौकिक रूप हमारे सामने था ।
लौटते समय संरक्षित क्षेत्र में   रखे गये दो अनाथ ग्रिज़ली  भालुओं तथा लम्बर-जैक-शो को देखा।आगे चलने पर हमने देखा कि विशालकाय  पेड़ों के तनों को - कहीं  मूल निवासियों की आदमकद मनमोहक मूर्तियों का तो कहीं विशालकाय बाज ,उल्लू , बिल्ली ,ग्रिज़ली भालू ,कीटों के रूपाकार में ऐसे ढाला गया था की वे सजीव लग रहे थे ।पर्वत से नीचे जाने का मन किसी का भी नहीं था पर लौटना तो था ही । लगा समय कुछ ज़्यादा ही तेज़ी से दौड़ रहा है । बेमन से हम सभी गोंडोला की ओर  बढ़ रहे थे कि भारती की नज़र  पूरी घाटी की सैर करवाने वाली ट्राली पर पड़ी ।आशुतोष नें आखिर  में जाने वाले गोंडोला का समय पूछा और हम सब चारों उसमें बैठ कर पर्वत के दूसरी ओर काफी नीचे तक गये । इस ट्राली में बैठने का रोमांच अलग था क्योंकि ये गोंडोला की तरह बंद नही ,अपने यहाँ मेलों में लगने वाले झूलों (मैरी-गो-राऊंड)की तरह की लम्बी कुर्सियों की तरह थे ।मतलब यह कि हम ठंडी हवाओं के तेज़ थपेड़ों को अपने चेहरे और पूरे बदन पर  महसूस कर रहे थे। नीचे उतर कर हम ने घाटी को देखा ।पैरों के नीचे यहाँ भी काफी बर्फ़ थी ,सर्दियों में इस स्थान पर स्कींग होती है ।-अंत में, पूरे वैनकुवर को गोंडोला से निहारते हुए, हमनें ग्राउज़ माउन्टेन की मधुर -मदिर यादों की गठरी को संभाला और लौट आये ।

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