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शनिवार, 4 जुलाई 2015

४ जुलाई **** मानव का धर्म****मानवता ।

४ जुलाई - - - -पापा का जन्मदिन हर बार स्मृतियों के उस पावन लोक में ले आता है जिसका रूप-स्वरूप कन्याकुमारी के आलौकिक विवेकानन्द शिला सा लगता है। हमारे चारों तरफ़ कैसा भी समंदर हो ; खुशियों की उजली-दूधिया लहरों वाला या कठिनाइयों के काले-विकराल  भंवर वाला, इस शिला पर स्थापित माँ कन्याकुमारी और स्वामी विवेकानंद के मन्दिरों सी अपूर्व शान्ति से परिपूर्ण कर हर प्रश्न का ,हर समस्या का समाधान दे जाता है **** पिताजी की यादों से भरा ये दिन ।
कल वैश्विक परिवेश में धार्मिक-असहिष्णुता की चर्चा करते हुए मेरे एक अज़ीज़ ने टिप्पणी की , ----- " आप जैसे होली-दिवाली-ईद-क्रिसमस-गुरूपरब को एक ही भाव से मनाने वाले लोग धर्म को अपने ही अर्थ देते हैं पर सारी दुनिया में ज़्यादातर लोग जो अपने-अपने मज़हब के दायरों में बंधे रहते हैं वे भी तो ग़लत नहीं हैं ? " मैनें हँस कर उनकी सूची में बौद्ध,जैन ,यहूदी पर्व भी जोड़ दिए और अपना पक्ष रखा । 
उनके जाने के बाद जब हमने अपने धार्मिक-विश्वासों की जड़ें टटोली तो सबसे पहले , पिताजी की वे स्मृतियाँ आँखों में तैर गईं जब पापा की इस लाड़ली गुड्डी नें, अपने पाँच-छह बरस की नन्ही हथेलियों में अपने हर प्रश्न का उत्तर देने वाले 'एनसाइक्लोपीडिया ' के 'बड़े से' हाथ को पूरा दम लगा कर झकझोरते हुए पूछा था," पापा आपका असली 'स्कूलवाला नाम ' क्या है ?" पापा नें हँसकर गोद में बिठाकर कहा था "बेटाजी, मेरा स्कूलवाला नाम है भाग्यचन्द्र सरकैक । " " फिर कोई अँकल आपको पंडित जी और कोई खान साहब क्यों बुलाता है ?" बालसुलभ जिज्ञासाओं से कभी ना हारने वाले पिताजी ने मेरे ही---- गुड्डी ,गुड़िया , सरबणी , स्वर्ण आदि प्रेमवश रखे गए नामों का उदाहरण देकर इस मेरी अबूझ पहेली को चुटकियों में सुलझा दिया था ।
ये बात तो बड़े होते-होते समझ आने लगी थी कि संस्कृत में वेद-वेदांगों , अरबी में क़ुरान शरीफ़ ,अंग्रेज़ी में बाईबल पढ़ने वाले हमारे पिताजी को सभी इतना अपना क्यों मानते थे । आज मुड़कर देखती हूँ तो भारत की राजधानी दिल्ली के सरोजिनी नगर का वो सरकारी घर सदा याद आता है जहां हर शाम को मुहल्ले भर के सभी बच्चे गायत्री-मंत्र और ॐ जय जगदीश गाया करते थे । उन सब में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी होते थे ,तब किसी के भी परिवार को कभी कोई आपत्ति नहीं हुआ करती थी। गुरू नानकदेव जी के गुरपुरब पर हम सब बच्चों का समूह अपने-अपने घर से लाये थैलों में लंगर के लिए आटा ,चावल ,उड़द दाल और चीनी हर घर से माँग कर लाते और इकट्ठा करके  गुरूद्वारे में देकर आते थे और सभी आनंदपूर्वक प्रसादा छकते थे । ईद को सिंवईयाँ ,क्रिसमस का केक, होली की गुझिया और रंग  ,दीपावली के पटाखे , लोहड़ी की रेवड़ियाँ-मूँगफली-फुल्लियाँ ,दक्षिण भारतीय 'गोलु पूजा ' में हर सोपान पर सजाने के लिए जमा की जाने वाली देवप्रतिमायें ,  खिलौने और रामलीला - - - - सभी में हम सब बच्चों की हिस्सेदारी रहती थी ।उस दौर में , आज से लगभग चार-पाँच दशक पहले की हमारी प्यारी दिल्ली में , हम सभी बच्चों ने - - सभी धर्मों को अपनी बचपन की सीमाहीन बाँहों में इतने प्यार और अपनेपन से सहेजा था कि बड़े होने से आज तक वे सभी त्यौहार और उनसे जुड़ी सारी खुशियाँ हमारे जीवन का अभिन्न अंग बनकर साथ-साथ चल रही हैं ।
   आज के इस धार्मिक-असहिष्णुता वाले वातावरण में जब एक धर्म दूसरे से अपने को बड़ा सिद्ध करने के लिए, अपने धर्म की लकीर को बड़ा बनाने के लिए, - - हर दूसरे धर्म की हर लकीर को मिटा कर छोटा करने की साज़िश में जुटा हुआ है तब हमें बचपन के वे परस्पर सौहार्द भरे दिन और शिद्द्त से याद आते हैं जब हमारे मुहल्ले के सब बच्चे मेरी माँ को अम्मा कहते थे !आपस का विश्वास इतना अटूट कि मेरी अम्मा मुहल्ले के किसी भी बच्चे की ग़लती पर उसे समझाती या डाँटतीं तो उसके परिवार के लोग या वो स्वयं, कोई सवाल-जवाब नहीं करते थे ! रात होते ही सब घरों के बाहर बान की चारपाइयों पर बिस्तर बिछते, पापा से कहानियाँ सुनते , दिन भर के अपने अनसुलझे सवालों के जवाब पाते ! अंत्याक्षरी के खेल और लोहड़ी की आग के पास फ़िल्मी-ग़ैरफ़िल्मी गीतों-ग़ज़लों की महफ़िल में दिल खोल कर हँगामा करते बड़े और बच्चे ! पिछले दो-तीन दशकों से दिल्ली में रहने वालों को शायद ये बातें कपोल-कल्पित कहानियों सी लगें पर - - - - यही मेरी दिल्ली की असली पहचान है ,जहां हम सब एक कुटुम्ब की तरह रहते रहे हैं । कोई बँटवारा नहीं बस आपस में खुशियाँ और अपनापन बाँटा जाता था ।
    दिलवालों की दिल्ली में अपना बचपन बिताने वाले हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारे माता-पिता ने हमें धर्मिक संकीर्णता की जगह धार्मिक समभाव का पाठ घुट्टी में पिलाया था । विभिन्न नामों से पुकारे जाने वाली उस परम सत्ता को कोई किसी भी प्रकार से प्रसन्न करना चाहे , उनके ईश्वर को दिए गए नामों , रीति-रिवाज़ों, तरीकों व परम्पराओं पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चहिये। ये सच हमें पिताजी ने बचपन के मेरे ही अनेक नामों का उदाहरण देकर , सीधी-सादी भाषा में इस तरह समझाया था कि वो मन में गहरे उतर कर, हमारे जीवन को सहज भाव से जीने की ऊर्जा बन गया।  
" जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी " का बालमन में समाया सत्य *******आज भी हमारे लिए वेदवाक्य है और सदा रहेगा । हमने तो यही माना और जाना है कि " धारयेति इति धर्म: " । भारतीय संस्कृति में प्रयुक्त शब्द  " धर्म " अन्य भाषाओं में अनूदित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका संबंध किसी पूजापद्धति से नहीं है । धर्म वह है जो संपूर्ण सृष्टि के जड़-चेतन , मूर्त-अमूर्त तत्वों के मध्य सामंजस्य हेतु अधिकार और कर्तव्य निर्धारित करने में सहायता करता है । इसकी परिधि में अखिल ब्रह्मांड आता है यह संप्रदाय या पंथ का पर्याय नहीं है ।भारतीय दर्शन में जल का धर्म रस, अग्नि का धर्म तेज , आकाश का शब्द , पृथ्वी का गंध और वायु का धर्म स्पर्श बताया गया है । 
     और - - - - मेरे विचार में सारी सृष्टि को संतुलित रखने की दृष्टि से - - - - मानव का धर्म है मानवता ।   
             
  

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