जाड़ों का मौसम

जाड़ों का मौसम
मनभावन सुबह

लोकप्रिय पोस्ट

लोकप्रिय पोस्ट

Translate

Google+ Badge

Google+ Followers

लोकप्रिय पोस्ट

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

बहुमुखी प्रतिभा के धनी, बाबा साहब अम्बेडकर जी ने भारत की अतुलनीय सेवा की है। मैंने उनके लेखों में भारतीय दर्शन की विवेचना को जितना समझा उसने भारतीय वैदिक संस्कृति के प्रति मेरी आस्था को और दृढ़ किया है कि निहित स्वार्थों के कारण भारतीय वर्णव्यवस्था को, समाज के विभाजन के लिए, ग़लत ढंग से पेश किया जाता रहा है। मई, सन् १९३६ में प्रकाशित अपनी पुस्तक(Annihilation of Caste) में बाबा साहब नें समाज के सबसे ' निचले वर्ग' में रखे जाने वाले वर्ण के इतिहास के बारे में लिखा..."यजुर्वेद और अथर्ववेद में ऋषि इस वर्ग के गौरव कामना करते हैं।इस वर्ग के ' सुदास ' ऋग्वेद के मंत्रों के रचयिता हैं, वे अश्वमेध यज्ञ करते हैं। शतपथ ब्राह्मण, में चतुर्थ वर्ण को यज्ञकर्त्ता के रूप में प्रस्तुत किया गया है । मैत्रायणी और कठक संहिता में, समृद्ध प्रजा के रूप में, सुदास और सायण द्वारा प्रजापालक राजाओं के रूप में चतुर्थ वर्ण के कई उदाहरण हैं। " ऋग्वेद की ऋचाओं से इस देश की सभ्यता को श्रेष्ठता की ओर ले जाने वाले भारतीय समाज का आधार रहे चार स्तम्भों (चारो वर्णों) में कोई छोटा-बड़ा नहीं था, पुरातात्विक प्रमाण भी कहते हैं कि विश्व की इस प्राचीनत्तम सभ्यता के प्रारंभिक लोग, यहाँ के मूल निवासी हैं कोई भी विदेशी नहीं था..... इसके ढेरों प्रमाण हमारे प्राचीन साहित्य और इतिहास में भी हैं।बेशक मैं मानती हूँ बाबा साहब के अनुभव उनके युगानुसार पीड़ादायक थे पर हमें भारतीय संस्कृति की सच्ची विरासत का सही ढंग से मूल्यांकन कर, बँटवारे की ग़लत मान्यताओं को अपने समाज से हटाकर , इस सत्य को उजागर करना होगा कि वासुधैव कुटुंबकम् को स्वीकारने वाला भारतीय धर्म क्या अपने ही समाज के एक भाग को त्याज्य मान सकता था? वो समाज..... जिसने कलयुग से पहले युग- - द्वापर युग में भी निषाद-पुत्री, दास्यी, मत्स्यगंधा.... 'सत्यवती' के पुत्र-वेदव्यास और पोत्रों-पांडवों को श्रेष्ठता के पद पर इस तरह आसीन किया कि आज भी महर्षि वेदव्यास के ज्ञान और पांडवों की वीरता अद्वितीय स्वीकारते हैं । भारतीय संस्कृति का विस्तृत परिवेश अपने समाज के हर अंग के सम्मान के प्रति हमारे उत्तरदायित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा रहा है, उत्तर हम सब को देना है .... मेरी नज़र में यही होगी कर्मठ समाज सुधारक भीमराव अम्बेडकर जी को सच्ची श्रद्धाँजलि।

रविवार, 27 दिसंबर 2015

मिर्ज़ा असद उल्ला बेग खां "ग़ालिब "

मिर्ज़ा असद उल्लाह बेग खां  "ग़ालिब "{२७ दिसंबर १७९६-१५ फरवरी १८६९}
जब की तुझ बिन नहीं कोई मौजूद ,
फिर ये हंगामा-ए-ख़ुदा क्या है  !
जान तुझ पर निसार करता हूँ ,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है  !!****
मैं ये पूरी शिद्दत से इस सच्चाई को मानती हूँ कि " ग़ालिब " ,एक ऐसे सुखनवर हैं जो वक्त की राह में गड़े हर मील के पत्थर पर अपनी क़लम के लासानी जादू का ऐसा अमिटअसर छोड़ गए हैं कि सदियों की दूरियाँ भी उस जादू को बेअसर नहीं कर पाई ना ही आने वाली सदियों में कर पायेंगी। " बाबा-ए-सुख़न " से हमारी मुलाक़ात करवाते वक़्त पिताजी ने समझाया था कि हिंदुस्तान में जन्मी उर्दू की मिठास को पहचानना है तो मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी से शुरुआत करो और एक पच्चीस पन्नों की आसमानी रंग की देवनागरी की पतली सी क़िताब "ग़ालिब की मशहूर ग़ज़लें " थमा दी थी । ये वो वक़्त था जब रेडियो पर भारतभूषण-सुरैया की फ़िल्म मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें गूँजती रहती थी।
        ******* बस तभी से। ......  एक सिलसिला चल निकला देवनागरी में उर्दू को समझने का। ....  और उर्दू शायरी को लिखने-पढ़ने का। 
   


मिर्ज़ा असद उल्ला बेग खां "ग़ालिब "

मिर्ज़ा असद उल्लाह बेग खां  "ग़ालिब "{२७ दिसंबर १७९६-१५ फरवरी १८६९}
जब की तुझ बिन नहीं कोई मौजूद ,
फिर ये हंगामा-ए-ख़ुदा क्या है  !
जान तुझ पर निसार करता हूँ ,
मैं नहीं जानता दुआ क्या है  !!****
मैं ये पूरी शिद्दत से इस सच्चाई को मानती हूँ कि " ग़ालिब " ,एक ऐसे सुखनवर हैं जो वक्त की राह में गड़े हर मील के पत्थर पर अपनी क़लम के लासानी जादू का ऐसा अमिटअसर छोड़ गए हैं कि सदियों की दूरियाँ भी उस जादू को बेअसर नहीं कर पाई ना ही आने वाली सदियों में कर पायेंगी। " बाबा-ए-सुख़न " से हमारी मुलाक़ात करवाते वक़्त पिताजी ने समझाया था कि हिंदुस्तान में जन्मी उर्दू की मिठास को पहचानना है तो मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी से शुरुआत करो और एक पच्चीस पन्नों की आसमानी रंग की देवनागरी की पतली सी क़िताब "ग़ालिब की मशहूर ग़ज़लें " थमा दी थी । ये वो वक़्त था जब रेडियो पर भारतभूषण-सुरैया की फ़िल्म मिर्ज़ा ग़ालिब की ग़ज़लें गूँजती रहती थी।
        ******* बस तभी से। ......  एक सिलसिला चल निकला देवनागरी में उर्दू को समझने का। ....  और उर्दू शायरी को लिखने-पढ़ने का। 
   


बुधवार, 9 सितंबर 2015

ये साथ बरसों का है या सदियों का ,
मैं बावरी ये क्या जानूँ !
ये रिश्ता साँसों की तरह ज़रूरी है इस सच को ,
हर पल सीने में ज़िंदगी बन धड़कता जानूँ !!
सपनों की तामीर के संदली लम्हों में 
खिली-खिली तेरी हँसी को ,
महकते गुलाब की पंखुड़ियों पर ठहरे हुए
रुपहली चाँदनी में ढले मोती मानूँ  !
पिछली तल्ख़ियों को आँगन से बुहार ,
खुशियों की रंगोली सजाने के लिए ,
सुबह की नई-नवेली धूप सी ,
सिन्दूरी नर्म एहसासों की मिट्टी रांधूँ  !!
मेरे हमसफ़र  ! तेरे नाम से सजे इस दिन के मुक़ददस दरवाज़े पर आज फिर ,
गेरू के अल्पने पर मंगल कलश रख ,आम के पत्तों के शुभेच्छाओं वाले हरे-भरे बंदनवार बांधूँ  !! 

शनिवार, 4 जुलाई 2015

४ जुलाई **** मानव का धर्म****मानवता ।

४ जुलाई - - - -पापा का जन्मदिन हर बार स्मृतियों के उस पावन लोक में ले आता है जिसका रूप-स्वरूप कन्याकुमारी के आलौकिक विवेकानन्द शिला सा लगता है। हमारे चारों तरफ़ कैसा भी समंदर हो ; खुशियों की उजली-दूधिया लहरों वाला या कठिनाइयों के काले-विकराल  भंवर वाला, इस शिला पर स्थापित माँ कन्याकुमारी और स्वामी विवेकानंद के मन्दिरों सी अपूर्व शान्ति से परिपूर्ण कर हर प्रश्न का ,हर समस्या का समाधान दे जाता है **** पिताजी की यादों से भरा ये दिन ।
कल वैश्विक परिवेश में धार्मिक-असहिष्णुता की चर्चा करते हुए मेरे एक अज़ीज़ ने टिप्पणी की , ----- " आप जैसे होली-दिवाली-ईद-क्रिसमस-गुरूपरब को एक ही भाव से मनाने वाले लोग धर्म को अपने ही अर्थ देते हैं पर सारी दुनिया में ज़्यादातर लोग जो अपने-अपने मज़हब के दायरों में बंधे रहते हैं वे भी तो ग़लत नहीं हैं ? " मैनें हँस कर उनकी सूची में बौद्ध,जैन ,यहूदी पर्व भी जोड़ दिए और अपना पक्ष रखा । 
उनके जाने के बाद जब हमने अपने धार्मिक-विश्वासों की जड़ें टटोली तो सबसे पहले , पिताजी की वे स्मृतियाँ आँखों में तैर गईं जब पापा की इस लाड़ली गुड्डी नें, अपने पाँच-छह बरस की नन्ही हथेलियों में अपने हर प्रश्न का उत्तर देने वाले 'एनसाइक्लोपीडिया ' के 'बड़े से' हाथ को पूरा दम लगा कर झकझोरते हुए पूछा था," पापा आपका असली 'स्कूलवाला नाम ' क्या है ?" पापा नें हँसकर गोद में बिठाकर कहा था "बेटाजी, मेरा स्कूलवाला नाम है भाग्यचन्द्र सरकैक । " " फिर कोई अँकल आपको पंडित जी और कोई खान साहब क्यों बुलाता है ?" बालसुलभ जिज्ञासाओं से कभी ना हारने वाले पिताजी ने मेरे ही---- गुड्डी ,गुड़िया , सरबणी , स्वर्ण आदि प्रेमवश रखे गए नामों का उदाहरण देकर इस मेरी अबूझ पहेली को चुटकियों में सुलझा दिया था ।
ये बात तो बड़े होते-होते समझ आने लगी थी कि संस्कृत में वेद-वेदांगों , अरबी में क़ुरान शरीफ़ ,अंग्रेज़ी में बाईबल पढ़ने वाले हमारे पिताजी को सभी इतना अपना क्यों मानते थे । आज मुड़कर देखती हूँ तो भारत की राजधानी दिल्ली के सरोजिनी नगर का वो सरकारी घर सदा याद आता है जहां हर शाम को मुहल्ले भर के सभी बच्चे गायत्री-मंत्र और ॐ जय जगदीश गाया करते थे । उन सब में हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी होते थे ,तब किसी के भी परिवार को कभी कोई आपत्ति नहीं हुआ करती थी। गुरू नानकदेव जी के गुरपुरब पर हम सब बच्चों का समूह अपने-अपने घर से लाये थैलों में लंगर के लिए आटा ,चावल ,उड़द दाल और चीनी हर घर से माँग कर लाते और इकट्ठा करके  गुरूद्वारे में देकर आते थे और सभी आनंदपूर्वक प्रसादा छकते थे । ईद को सिंवईयाँ ,क्रिसमस का केक, होली की गुझिया और रंग  ,दीपावली के पटाखे , लोहड़ी की रेवड़ियाँ-मूँगफली-फुल्लियाँ ,दक्षिण भारतीय 'गोलु पूजा ' में हर सोपान पर सजाने के लिए जमा की जाने वाली देवप्रतिमायें ,  खिलौने और रामलीला - - - - सभी में हम सब बच्चों की हिस्सेदारी रहती थी ।उस दौर में , आज से लगभग चार-पाँच दशक पहले की हमारी प्यारी दिल्ली में , हम सभी बच्चों ने - - सभी धर्मों को अपनी बचपन की सीमाहीन बाँहों में इतने प्यार और अपनेपन से सहेजा था कि बड़े होने से आज तक वे सभी त्यौहार और उनसे जुड़ी सारी खुशियाँ हमारे जीवन का अभिन्न अंग बनकर साथ-साथ चल रही हैं ।
   आज के इस धार्मिक-असहिष्णुता वाले वातावरण में जब एक धर्म दूसरे से अपने को बड़ा सिद्ध करने के लिए, अपने धर्म की लकीर को बड़ा बनाने के लिए, - - हर दूसरे धर्म की हर लकीर को मिटा कर छोटा करने की साज़िश में जुटा हुआ है तब हमें बचपन के वे परस्पर सौहार्द भरे दिन और शिद्द्त से याद आते हैं जब हमारे मुहल्ले के सब बच्चे मेरी माँ को अम्मा कहते थे !आपस का विश्वास इतना अटूट कि मेरी अम्मा मुहल्ले के किसी भी बच्चे की ग़लती पर उसे समझाती या डाँटतीं तो उसके परिवार के लोग या वो स्वयं, कोई सवाल-जवाब नहीं करते थे ! रात होते ही सब घरों के बाहर बान की चारपाइयों पर बिस्तर बिछते, पापा से कहानियाँ सुनते , दिन भर के अपने अनसुलझे सवालों के जवाब पाते ! अंत्याक्षरी के खेल और लोहड़ी की आग के पास फ़िल्मी-ग़ैरफ़िल्मी गीतों-ग़ज़लों की महफ़िल में दिल खोल कर हँगामा करते बड़े और बच्चे ! पिछले दो-तीन दशकों से दिल्ली में रहने वालों को शायद ये बातें कपोल-कल्पित कहानियों सी लगें पर - - - - यही मेरी दिल्ली की असली पहचान है ,जहां हम सब एक कुटुम्ब की तरह रहते रहे हैं । कोई बँटवारा नहीं बस आपस में खुशियाँ और अपनापन बाँटा जाता था ।
    दिलवालों की दिल्ली में अपना बचपन बिताने वाले हम सौभाग्यशाली हैं कि हमारे माता-पिता ने हमें धर्मिक संकीर्णता की जगह धार्मिक समभाव का पाठ घुट्टी में पिलाया था । विभिन्न नामों से पुकारे जाने वाली उस परम सत्ता को कोई किसी भी प्रकार से प्रसन्न करना चाहे , उनके ईश्वर को दिए गए नामों , रीति-रिवाज़ों, तरीकों व परम्पराओं पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चहिये। ये सच हमें पिताजी ने बचपन के मेरे ही अनेक नामों का उदाहरण देकर , सीधी-सादी भाषा में इस तरह समझाया था कि वो मन में गहरे उतर कर, हमारे जीवन को सहज भाव से जीने की ऊर्जा बन गया।  
" जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी " का बालमन में समाया सत्य *******आज भी हमारे लिए वेदवाक्य है और सदा रहेगा । हमने तो यही माना और जाना है कि " धारयेति इति धर्म: " । भारतीय संस्कृति में प्रयुक्त शब्द  " धर्म " अन्य भाषाओं में अनूदित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका संबंध किसी पूजापद्धति से नहीं है । धर्म वह है जो संपूर्ण सृष्टि के जड़-चेतन , मूर्त-अमूर्त तत्वों के मध्य सामंजस्य हेतु अधिकार और कर्तव्य निर्धारित करने में सहायता करता है । इसकी परिधि में अखिल ब्रह्मांड आता है यह संप्रदाय या पंथ का पर्याय नहीं है ।भारतीय दर्शन में जल का धर्म रस, अग्नि का धर्म तेज , आकाश का शब्द , पृथ्वी का गंध और वायु का धर्म स्पर्श बताया गया है । 
     और - - - - मेरे विचार में सारी सृष्टि को संतुलित रखने की दृष्टि से - - - - मानव का धर्म है मानवता ।   
             
  

रविवार, 21 जून 2015

** २१ जून २०१५ **

      २७ सितम्बर २०१४ को संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने भाषण में भारत के प्रधान-मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर " योग " को वैश्विक जीवन शैली और मानवीय मूल्यों से जोड़ कर सारे प्रतिनिधियों के सामने इस तरह रखा कि ११ दिसंबर२०१४  को केवल ९०दिनों में १९३ सदस्योंवाली संयुक्त-राष्ट्रसभा के १७७ सदस्यों द्वारा समर्थित मोदीजी के प्रस्ताव को ऐसी स्वीकृति मिली जो समय और समर्थन दोनों ही दृष्टियों से अभूतपूर्व है। अत्यंत हर्ष का विषय है कि आज का दिन समस्त विश्व में अंतर्राष्ट्रीय-योग-दिवस के रूप में मनाया जा रहा है ।
सिंधु घाटी की सभ्यता से प्राप्त अवशेष हों या वेदों की ऋचाओं में वर्णित ज्ञान या  उपनिषदों ,पुराणों ,आरण्यकों के सूत्र भी में शरीर ,मन,चेतना को एकसूत्र में बाँधने वाले योग की अनेकानेक परिभाषायें मिलती हैं। धरती को अपनी माता और वसुधा के हर प्राणी को कुटुम्बी मानने वाले हमारे गौरवशाली देश की एक अद्वितीय विरासत आज पूरा विश्व अपना रहा है। .... यही घोषणा है उस सत्य की कि भारतीय सांस्कृतिक चिंतन देश,काल और  सभ्यताओं की हर सीमा से परे … सार्वभौमिक ,सर्वदेशिक ,सर्वकालिक चिंतन है । आइये २१ जून २०१५ को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को एक ऐसे भव्य,और पावन समारोह के रूप में मनायें और परस्पर भाईचारे और विश्व एकात्मता को भाव जगायें  ।