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शनिवार, 2 जून 2012

महक भरी यादें -- हिमाचल की


                          
दिल्ली की आग बरसाती जेठ की दोपहरी; मायके की यादों के करीब ले आती हैं |हिमाचल प्रदेश के कोटगढ़ का  गाँव दलान, उसमें सूरजमुखी,नर्सासिस,कृष्णकमल(passion flower),चांपा,कास्मास(cosmos) के फूलों से घिरा एक घर उस घर के सामने के दालान में सेब ,अंजीर के पेड़ |दालान से नीचे सीढ़ीनुमा खेतों की कतारें |हरियाली की सीमा पर हाशिये की काली लकीर सी सड़क पर बसों,कारों.मोटरसाईकिलों व पैदल चलते लोगों की आवा- जाही बनी रहती है |गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू होने के सप्ताह भर पहले से, पिताजी की चिट्ठियाँ; दिल्ली की गर्मी में, ठंडी हवाओं के संदेशे लेकर आ जाती थी|"आज भी दूर सड़क के इस ओर आते मोड़ पर, दिल्ली से आने वाली बस को देखकर,नीचे अपनी सड़क पर आप सबका इंतज़ार किया "  लिखने का ये सिलसिला २३ अक्टूबर १९९२ तक ,पापा के आँखें मूंदने तक लगातार चलता रहा | -फिर इस शिद्दत से हमारा इंतजार करने वाला कोई नहीं रहा |पर - उस घर, उस जगह, उस वादी में पापा की बिखरी अनेकों यादें हमें हर बार आवाज़ देती हैं| ख़ासकर  जेठ के महीने में इन आवाजों के साथ जुडी तस्वीरें आँखों के सामने ताज़ा हो जाती हैं |
 नारकंडा से, महाभारत कालीन देवी के मन्दिर , हाटु के लिए जाते समय आज भी - गूजरों के टोले, भीम का चूल्हा ,प्यास बुझाने वाले ब्रांस के फूल, मन्दिर के पास वाली शिला(जिस पर पापा, कंपकपाती ठंड में बर्फ़ के बीच साधना करते थे)जौबाग़ की हरी ज़मीन पर बिछी बनफ्शे के जामुनी फूलों वाली चादर ;सभी पापा की सुनाई कथाओं को दोहराते से जान पड़ते हैं |
काली माँ के पुत्र डूमदेवता ,सतलुज नदी (शतद्रु ), सतलुज के उस पार खेगसु की कुष्मांडा देवी,सराहन की भीमाकाली आदि के पौराणिक व ऐतिहासिक विवरणों की गाथाएँ आज भी बचपनके उन निश्चिंतता भरे वक्त को ताज़ा कर जाती हैं जब गर्मियों की छुट्टियों का सीधा-सादा मतलब था - हिमाचल की घुमावदार सडकें , देवदार ,कैल , केड़ो,चीड़ के पेड़ों की महक, पेड़ों के बीच से गुज़रती हवाओं की सरसराहट ,कुई के सफ़ेद फूलों की मीठी महक ,अंजीर,प्लम ,खुमानी ,कमष्ण के ताज़ा खटमीठे स्वाद और दरिया के पानी की कलकल - छलछल |
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1 टिप्पणी:

anoosh ने कहा…

In this scorching heat of Delhi you have given a treat of cold vibe of memories which we would like to relive again N again …….