
छलपूर्वक बंदी बनाने वाले बादशाह औरग़ज़ेब की कैद से अपने बुद्धिचातुर्य से छूटे शिवाजीराजे जब सन्यासी के वेश में माँ से भिक्षा लेने गए थे तब राजमाता ने उनको पहचान लिया और कहा , " अब मुझे विश्वास हो गया है कि मेरा पुत्र स्वराज्य की स्थापना अवश्य करेगा । ''
वीरमाता के आज्ञाकारी वीरपुत्र शिवजी ने बीजापुर और मुग़ल सल्तनत को लोहे के चने चबवाए और रायगढ़ को राजधानी बनाकर लगभग सम्पूर्ण भारत में हिंदवी स्वराज स्थापित करने की नींव रखी ।
मेरे विचार से ; जीजाबाई कार्यक्षेत्र और संतान के व्यक्तित्व निर्माण के दोहरे दायित्वों को जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी कुशलता पूर्वक निभाती रहीं । '' स्वराज्य के लिए संघर्ष " करने की पहली प्रेरणाशक्ति। यह सत्य किसी भी युग में नकारा नही जा सकता कि मातृशक्ति का सम्मान ही किसी समाज और राष्ट्र को यशस्वी बनाता है ।
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