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मंगलवार, 12 जून 2012

"आषाढ़" का रूमानी संसार

 "आषाढ़" - इस शब्द का उच्चारण हमें हमेशा ही उस जगह पहुँचा देता है जहाँ  विश्व-साहित्य में सूर्य बनकर चमकने वाले "कालिदास" के 'मेघदूतम्'  के पन्नों पर लिखे शब्द एक रूमानी दुनिया के दरवाज़े खोल कर हमें वहाँ पहुंचा कर  छोड़ आते हैं जहाँ नवरस के रसराज श्रृंगार का वियोग श्रृंगार- - पर्वतों पर घिर आए मेघों सा कभी अपने कोमल पाश में बांधता है तो कभी पैथौस की बूंदों से तन-मन को भिगोता है । इस वर्ष ये मेघ दिल्ली के आसमान को तो नही सजा पाए परन्तु  - - - परितोष-मेघा(सगाई की सालगिरह) बन कर  हमारे आंगन में एक सतरंगी रूमानी संसार बसा गए हैं।आज के दिन इस कथा के कई नए अर्थ उभर रहे हैं  ऐसे अर्थ जो पति-पत्नी के सम्बन्धों की प्रगाढ़ता को केवल पत्नी नहीं , पति के सन्दर्भ में भी समझाते हैं - ठीक वैसे ही जैसे ; भारतीय संस्कृति के आदिदेव शिव ने समझाया था । ' मेघदूतम् ' की जिस कथा को आषाढ़ के मेघ हर बार दोहराते हैं उसे आज हम नए अर्थों के साथ फिर दोहरा रहे हैं ।
- - पूर्व मेघ की कथा इस प्रकार शुरू होती है - - - - - - - - - - - -
              देवताओं के धनपति कुबेर की राजधानी  अलकापुरी में एक यक्ष की नियुक्ति यक्षराज कुबेर की प्रातःकालीन पूजा के लिए प्रतिदिन मानसरोवर से स्वर्ण कमल लाने के लिए की गयी थी। यक्ष का अपनी पत्नी के प्रति बड़ा गहरा अनुराग था, इस कारण एक दिन उससे अपने नियत कार्य में  प्रमाद हो गया और वह समय पर पुष्प नहीं पहुंचा पाया। कुबेर को यह सहन नहीं हो सका और उन्होंने यक्ष को क्रोध में एक वर्ष के लिए देश निकाला दे दिया ।धनपति कुबेर ने कहा कि जिस पत्नी के प्रेम में उन्मत्त होकर तुमने उन्माद किया है अब तुम उससे एक वर्ष तक नहीं मिल सकते।
अपने स्वामी का शाप सुनकर यक्ष बड़ा छटपटाया, उसका सारा राग-रंग जाता रहा। अपने शाप की अवधि बिताने के लिए उसने रामगिरि पर्वत पर स्थित आश्रमों की शरण ली। उन आश्रमों के समीप घनी छायावाले हरे-भरे वृक्ष लहलहाते थे। वहां जो तालाब तथा सरोवर थे उनमें कभी सीताजी ने स्नान किया था। इस कारण उन जलाशयों का  महत्व बढ़ गया था।
रामगिरि से अलकापुरी दूर थी। अपनी पत्नी का एक क्षण का भी वियोग जिसके लिए असह्य था, वह यक्ष अब इन आश्रमों में रहते हुए सूखकर कांटा हो गया था। उसके शरीर पर जितने आभूषण थे वे भी ढीले होकर इधर-उधर गिरने लगे थे। इस प्रकार वियोग में व्याकुल उस यक्ष ने कुछ मास तो उन आश्रमों में किसी-न  किसी प्रकार बिताए, किन्तु जब गर्मी बीती और आषाढ़ का पहला दिन आया तो यक्ष ने देखा कि सामने पहाड़ी की चोटी बादलों से लिपटी हुई है ।उसे देखकर  यक्ष को ऐसा लगा जैसे कि कोई हाथी अपने माथे की टक्कर से मिट्टी के टीले को ढोने का प्रयत्न कर रहा है।
उन बादलों को देखकर यक्ष के मन में प्रेम उमड़ पड़ा। वह बड़ी देर तक खड़ा-खड़ा उन बादलों को एकटक देखता ही रहा। क्योंकि वह जानता था कि  बादलों को देखकर वे ही जन सुखी होते हैं जो अपनी पत्नी के समीप हैं, विरही जन का मन बादलों को देखते ही डोल जाता है ।  उस विरह-व्याकुल यक्ष की पीड़ा का वर्णन ही शब्दों से परे है ! वह बेचारा तो बहुत दूर देश में पड़ा हुआ अपनी पत्नी के वियोग में तड़प रहा था इसलिए उसने आषाढ़ के मेघों को अपना दूत बनाया और अपनी विरह की पीड़ा को पाती बनाकर अपनी पत्नी तक पर्वतों की ऊंचाई तक इस तरह पहुँचाया कि उसकी वैयक्तिक पीड़ा सबके  हृदय को झकझोरने में सफल हो गयी

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