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सोमवार, 12 जनवरी 2015

युगद्रष्टा स्वामी विवेकानन्द जी |

बचपन से मेरे आदर्श रहे- स्वामी विवेकानंद जी मेरे मार्गदर्शक रहे हैं । आज स्वामी जी के जन्मदिन पर अपने मन में घुमड़ते एक प्रश्न का उत्तर खोजने की चेष्टा कर रही हूँ ।  आजकल एक विचार वातावरण में कई-कई बार उछाला जाता है  ' धर्म से जुड़े साधु-सन्यासियों  को राजनीति व राष्ट्र की नीतियों पर नहीं बोलना चाहिए ' !!. ... परन्तु मैंने तो यही जाना है कि परतंत्रता के उस युग में महर्षि अरविन्द , रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ ,नेताजी आदि अनेक क्रांतिकारियों के भी प्रेरणास्रोत रहे हैं -- स्वामी जी । सन १८९१ में कलकत्ता में छात्रों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा था  "अँग्रेज़ों तथा अन्य पश्चिमी लेखकों द्वारा लिखित हमारे देश का इतिहास हमारे मन को कमज़ोर नही कर सकता ,वे केवल हमारे पतन की चर्चा करते हैं । इनमें ऐसे विदेशी भी हैं जो हमारे स्वभाव ,रीति -रिवाज़ों ,धर्म और दर्शन के बारे में बहुत कम जानते हैं । वे भारत के बारे में विश्वसनीय और निष्पक्ष इतिहास कैसे लिख सकते हैं। ...कभी भी हमें ये नहीं बताया जाता कि हमारे बीच में भी महापुरूषों का जन्म हुआ है । हमें इंग्लैण्ड के पूर्वजों की तो एक-एक तिथि याद हो जाती है पर दुःख कि अपने देश के अतीत से हम बेखबर रहते हैं । जब मनुष्य अपने पूर्वजों पर लज्जित होने लगे समझो की उसका पतन आ गया है । " ये भी तो साधु -सन्यासी का उद्घोष था जो युवापीढ़ी में जागृति की चिंगारी फूँक रहा था  !
फिर आज ऐसे स्वर क्यों उभर रहे हैं ? हाँ अंतर अवश्य करना होगा कि ये साधु ही है  ---- भौतिक विलासिता में लिप्त कोई  स्वादु तो नही जिसका स्वार्थ राष्ट्रहित को तिलांजलि देकर आत्म स्तुति में मग्न है । भारत में अनादि काल से ऋषियों द्वारा राजकाज में राजा के मार्गदर्शन की परम्परा  रही है ।वैदिक-काल की ऋचाएँ भी  हमारी राष्ट्र की संकल्पना का आंरभ  ऋषियोँ से जोड़ती हैं -- " भद्रम् इच्छन्त ऋषयः तपोदीक्षाम् उपनिषेद् दुरग्रे,ततोराष्ट्रम् बलम् ओजस्नाताम् " अर्थात ज्ञानवान ऋषियोँ के मन में श्रेष्ठ इच्छा जागी ,इच्छा के तप से राष्ट्र जन्मा , साधना से दीक्षित इस राष्ट्र में शक्ति-सामर्थ्य -ओजस्विता आई । मेरी समझ में तो यही बात आती है कि मेरा देश शस्त्र की नोक पर नही बना इसलिए यहाँ भावनात्मक पक्ष प्रधान है ,तभी तो यह विश्व का एकमात्र राष्ट्र है जिसके निवासी इसे भारतमाता कहते हैं और माँ का संबंध साडी दुनिया में भावनात्मक ही है । इस दृष्टि से भारत की राजनीति और राष्ट्रनीति में साधु -सन्यासियों का स्थान हमेशा था और हमेशा रहेगा ।   
यह सच है कि प्रत्येक युग सत्य को अपना तात्कालिक अर्थ देकर परिभाषित करता है परन्तु सत्य का मूल स्वरूप बदलता नही है। मूल्यों के संक्रांति काल ' द्वापर ' में भी यद्यपि तात्कालिक  ' अश्वत्थामा हतो ' के अर्द्धसत्य को मान्यता मिली परन्तु क्या युधिष्ठिर,पाण्डव या युगपुरुष कृष्ण भी गुरू द्रोणाचार्य की हत्या के अपराधबोध से कभी उबर पाये होंगे ? भारत में वशिष्ठ ,विश्वामित्र ,चाणक्य ,विवेकानन्द ,कबीर ,गुरू गोबिंद सिंह जैसे राष्ट्रभक्त ऋषियों-सन्तोँ के मार्गदर्शन का सम्मान होता रहा है ,होता रहेगा  ।
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