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रविवार, 15 फ़रवरी 2009

वसंतोत्सव १५ फरवरी २००९

माघी पूर्णिमा से पहले पूरे भारतवर्ष में माघ शुक्ल पक्ष की पंचमी को माँ सरस्वती की पूजा-अर्चना का पवित्र पर्व उल्लासऔर श्रद्धापूर्वक मनाया गया ।आज चौदह फ़रवरी को ३१ जनवरी को मनाई गई श्रीपंचमी की याद क्यों आई ?इस का कारण सीधे –सीधे जुड़ा है मेरे इस विचार से -जो मुझे बाध्य कर रहा है यह सोचने के लिए कि हम अपनी वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाली प्रबुद्ध नई पीढ़ी को ;जिनकी प्रतिभा का लोहा आज पूरा संसार मान रहा है – उनको साँस्कृतिक विरासत के रूप में क्या देना चाहते हैं ? सतत प्रगतिशीलता ---- भारतीय सँस्कृति का प्राण तत्व है । परम सत्ता के साकार - निराकार स्वरूप की स्वीकृति , अनेकों देवी-देवता, प्रकृति के हर रूप की उपासना - - इतना व्यापक ,इतना विस्तृत वैचारिक धरातल प्रदान करने वाले ऋषियों –मनीषियों की विरासत ही इस प्राचीनतम सभ्यता की जीवंतता का मूल रहस्य है
विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में एक समानता सर्वत्र मिलती है कि ये सभी प्रकृति- पूजक और - देव -पूजक संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती थीं | भारतीय और यूनानी सभ्यता भी इसी परिपाटी की पोषक रहीं यही कारण है कि दोनों देशों में समय का लगभग एक ही कालांश वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता था |भारत में माघ शुक्ल पँचमी से लेकर फाल्गुनी पूर्णिमा तक चालीस दिन इस उत्सव के लिए निर्धारित थे तो यूनान में एथेंस के कैलेंडर का गमेलिओं माह | भारतीय परम्परा में इस पर्व का प्रारंभ समस्त कलाओं और ज्ञान-विज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा -अर्चना से करके शेष दिन प्रेम और सौन्दर्य के देवता कामदेव और उनकी पत्नी रतिदेवी को समर्पित कर समग्र समाज ; पुष्प , पुष्पराज .चंदन व सुगंधियों आदि से एक -दूसरे का स्वागत -सत्कार कर , संगीत , नृत्य , नाटक , चित्रकला आदि विविध कला संगोष्ठियों के साथ -साथ सामूहिक - भोज आयोजित कर - बसंत ऋतु के सौन्दर्य को , उसके उल्लास को अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में उतार लाते थे | यहाँ मैं यह भी कहना चाहती हूँ कि वैदिक काल में कामदेव को एक विशेष पद पर प्रतिष्ठित किया गया था | ऋग्वेद की ऋचाओं में --अस्तित्वहीन को अस्तित्व प्रदान करने वाली प्रेरक शक्ति का नाम है --कामदेव | सृष्टी के प्रत्येक प्राणवान और संवेदनशील तत्व में उत्पन्न - लोक कल्याण की , अपरिमित दया मनोभावों , प्रेम की , स्नेह की , प्रत्येक प्राणी के अस्तित्व की स्वीकृती - इन मनोभावों को प्रथम बार जगाने वाली शक्ति का नाम है --मदन | जगत में अपनी दार्शनिक और आध्यात्मिक उपादेयता को अपने कार्यों से सिद्ध करने वाले इस देवता के कार्य परमार्थ से जुड़े रहे | वसंतोत्सव ,मदनोत्सव , कामोत्सव , कौमुदी -उत्सव की पूर्णाहुती अर्थात रंगोत्सव होली से जुड़ी प्रहलाद -होलिका , श्री कृष्ण -राधा संबंधी अनेकों कथाएँ हमें याद हैं परन्तु प्राचीनतम "काम-दहन " की स्मृतियों को भुला बैठे (तमिलनाडु में आज भी इस पर्व को काम- दहनम कहते हैं ) लोककल्याण के लिए -तारकासुर के अत्याचारों से सृष्टि को बचाने के लिए - शिवपुत्र प्राप्ती हेतु भगवान शंकर की तपस्या को भंग कर उनके कोप -भाजन बन भस्म हुए कामदेव के सम्मान में पहले दिन अग्नि प्रज्ज्वलित कर उसकी भस्म का तिलक लगाया जाता है और अगले दिन ( रतिविलाप के बाद द्रवित हुए शिव के वरदान से कामदेव को "अनंग " रूप में पुनर्जीवन मिला ) कामदेव के पुनः आगमन की प्रसन्नता को मदनोत्सव के रूप में रंगों , सुगंधों और सामूहिक -भोज के आयोजनों में प्रकट किया जाता था | वैदिक -काल के लोकहितकारी "अनंग " का स्वरूप पौराणिक काल तक आते -आते अप्सराओं के स्वामी का हो गया | वर्तमान युग ; जीवन के चार पुरुषार्थों में से तीसरे स्थान पर आने वाले - काम के देवता को क्या स्थान देता है मेरा अभिप्राय यहाँ उस चर्चा से नही वरन वसंतोत्सव की परम्परा की प्राचीनता से है | यूनान में "ग्रेट-डायोन्यस्स " को वसंतोत्सव के रूप में मनाया जाता था |डायोन्यस्स , यूनानी देवता जीयस की मानवी पत्नी सेमेली का ऐसा पुत्र था जिसे अपनी सौतेली माता देवी हेरा की ईर्ष्या के कारण अपनी माता से वंचित होना पड़ा | देवी हेरा उसे भी समाप्त ना कर दे इसलिए जीयस ने अपने बड़े पुत्र हर्मिस (रोमन देवतामर्करी) को उसकी रक्षा का दायित्व सौंप दिया | हर्मिस ने डायोन्यस्स को भारत के न्यास पर्वत पर अप्सराओं के संरक्षण में छोड़ दिया जिन्होनें युवा होने तक उसके पालन -पोषण और शिक्षा आदि का भार वहन किया और
कृतज्ञता स्वरूप जीयस नें उन अप्सराओं को वृषभ तारामंडल में वर्षा नक्षत्रों ह्यडेस का स्थान दिया | युवा डायोन्यस्स अरब ,सीरिया आदि देशों से होता हुआ अपने देश पहुँचा |अपने गुणों के कारण ओलम्पस में उसे देवता रूप में प्रतिष्ठा मिली | उसने अपने लोगों को कृषि और न्याय व्यवस्था सिखाई | डेल्फी में उसकसमझाता -डायोन्यस्स समझाता माह चलने वाला ऐसा पर्व बन गया जहाँ भारतीय वसंतोत्सव सा ही वातावरण रहता था | बाद में - रोमन काल में इसी समय को "जूनो -फेब्रा " कहा गया | रोमन देवताओं के सम्राट ज्यूपिटर की पत्नी जूनो को समर्पित १४ फरवरी को लुप्रकैलिया-भोज का आयोजन होता था जिसमे बंद पर्चियों में लिखे नामों को उठा कर युवक युवतियों के जोड़े बनाये जाते माह भर उत्सव चलता और अन्तिम दिन इच्छुक युगल विवाह सूत्र में बंध जाते थे | परवर्ती रोमन सम्राट क्लेडियस द्वितीय की राज्यलिप्सा ने विवाह और इस पर्व को सैनिकों की भर्ती में बाधक मान कर बंद कर दिया |इस जनविरोधी नियम के प्रतिकार में संत वैलेन्टाईन और संत मोरियस नें लोगों का साथ दिया |वे विवाह के इच्छुक युगलों का विवाह राजाज्ञा के विरुद्ध तब तक करते रहे जब तक राजा को पता नही चला |पता चलने पर राजा नें पकड़े गये संत वैलेन्टाईन का सिर कटवा दिया |
मेरी समझ में तो वसंतोत्सव का पर्व एक ही सत्य समझाता है कि मानव प्रकृति की सन्तान है इस कारण उसमे बिखरे सौन्दर्य को ,उसके रंगों के वैभव को, उसके उल्लास को अपने जीवन में उतारने की अपनी नैसर्गिक प्रवृति को अपनाने की एक पुरातन परम्परा रूप बदल -बदल कर हर युग में उसे पर्वों से जोड़ती रहेगी |प्रसन्नता की अभिव्यक्ति का रूप क्या हो ये तो उसका अपना अधिकार-क्षेत्र है जिसे ना देश-काल की सीमा बाँध सकती है ना ही किसी राजदंड का भय रोक सकता है |

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