जाड़ों का मौसम

जाड़ों का मौसम
मनभावन सुबह

लोकप्रिय पोस्ट

लोकप्रिय पोस्ट

Translate

Google+ Badge

Google+ Followers

लोकप्रिय पोस्ट

गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

बारह फरवरी  को अपनी आँखों  के आप्रेशन से लेकर आज  सत्रह अप्रैल  तक -एक लंबा  समय गुज़र  गया है !
बिना  कुछ पढ़े लिखे  रहना  हमारे लिए किसी सज़ा से कम नही है  | इसलिए  पढ़ा चाहे ना  हो  पर आँखे बंद करके लिखने का काम हमने बंद नही किया  |  अब भी पूरी तरह से  डॉक्टर  साहब की आज्ञा  तो नही मिली  पर -- नया  न सही  पुराने को सहेजने  का लोभ हमे लैपटॉप  तक ले ही  आया
हम  अपनी डायरी के पन्नों  से उस  दौर की बातों को- जो हमने  सिर्फ़ खुद से कहकर खुद को ही सुनाई थी, आज पढने की भरपूर कोशिश के बाद लिखने  में  जुटे  हैं  -प र  आसान यह काम भी नही है  | अपने आप से किया गया वादा है  इसलिए  किश्तों  में ही सही काम सिलसिलेवार  करेगे ।  फरवरी माह  की तिथि  तेरह ,   गुरु  नानक देव जी की तरह  'तेरा ' तुझको  अर्पण का  आध्यात्मिक  संदेश  लेकर -  मुझ  तक - वसंत  ऋतु  में चाहकर भी आ ही नही पाई  ।  चाहकर  इसलिए  कह  रही हूँ  क्योंकि सुनती आई हूँ  कि दर्द की इन्तहा  में  भगवान  की ही याद आती  है  - -और  मेरे  तो  देह और  मन  दोनों  पीड़ा  में  थे ।  - -यूँ  भी अपने  देश  में कोई भी मौसम ,कोई भी त्यौहार पीड़ा से जुड़ता ही नही है । फिर वसंत ऋतु तो ऋतुराज है जिसमें दर्दभरे  तन-मन  की  हूक  कोयल  की  कूक  में  ही ढल  जाती  है  | 

        सन्दर्भ और अर्थ           (१ ४  फरवरी  २ ० १ ३ )

सन्दर्भों की पृष्ठभूमि बदलते ही;शब्दो को पहनाए गए अर्थों  के लिबास बदल  जाते  हैं  ,
समय की ठोकर से लड़खड़ा कर ;सहमी सी ज़िंदगी के सारे हालात  बदल जाते हैं । 
 जब  भी अल्हड़  मौसम दबे पाँव  आकर वादी के पेड़ों और पर्वतों के काँधों पर ,
 फूलों और घास के मखमली, रंगभरे  दरीचों पर कोहरे की  चादर  उड़ा  जाता है  ।
 वसंत में हर बार कुहूकते सुर सज जाते जब-जब; बौराए आम की शाखों पर ,
 तब महकते सपनों के अनगिनत दीप जला, जाने कौन  बाँसुरी  पर गाता  है  ।
 आज वो वादी नहीं, वो मंज़र भी नहीं-पर वो कोहरा; जो  मेरी आँखों रह गया ठहर कर  ,
 आस-उम्मीद की जतन से बाँधी मजबूत दीवारों को; आँसुओं के सैलाब से ढहाता है ।
  गीतों का मौसम भी कुछ परेशाँ सा है; गगन छूने के हौसलेवाला क्यों नहीं आया  झूलों पर,                        
  धुआँ-धुआँ से बादलों की शरारत ने वो जाल बुने कि अब दिन में भी अँधेरा ही मुस्कराता है ।    
  

कोई टिप्पणी नहीं: