जाड़ों का मौसम

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सोमवार, 9 जुलाई 2012

सावन के सुरमई उजालों में



बादलों की साझी चूनर ओढ़ ,बारिशों के पानी में , आज फिर तन-मन को भिगोयें हम दोनों  !
कागज़ की किश्तियों को , रंगीन सपनों की झालरों से सजा ,
आज फिर तैरायें हम दोनों  !!
बरसती ,गरजती ,कड़कती औ' लरज़ती सी इस रुत में ,आज फिर रूठें -मनाएँ  हम दोनों  !
चाय ,चीले -पकौड़ों की गर्माइश को, होंठों से पकड़ आज फिर देर तक बतियाएँ  हम दोनों ! !
बरखा की पायलों की मीठी सी रुनझुन के सुर-ताल पकड
 आज फिर गुनगुनाएँ  हम दोनों !
सावन के सुरमई उजालों में, यादों की नदी पर, आज फिर इन्द्रधनुषी पुल बांधें हम दोनों  ! !
मेघों नें प्यासी धरा को दिया बिन माँगे ,पानियों का जो नया दर्पण,
 उसमें आओ आज फिर  मापें अपनी गहराईयों को  हम दोनों  !
दुनियादारी  भुलाकर ,कूकती कोयल को ढूंढें , ओ मेरे मनमीत ! 
इस धुंधलके में आज फिर बचपन को खोज लायें कहीं से हम दोनों  ! !

1 टिप्पणी:

Anil Kumar Dubey ने कहा…

NOSTALGIC , mere manmeet is dhundhulke men aaj fir bachpan ko khoj laye khi se hum dono , wonderful poem.