सिक्किम में गंगटोक से ९ कि.मी. दूर ----प्रकृति के शांत सुरम्य अंचल में ७२०० फुट की ऊंचाई पर स्थित "हनुमान टोक "- - - - और मन्दिर परिसर में, श्रीराम-लक्ष्मण एवं शबरी की चिर - परिचित बेर खिलाने के दृश्य को सजीव करती ,भावुक करती चित्ताकर्षक प्रतिमाएँ !!
श्रीरामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में प्रभु श्री राम ने शबरी को ’भामिनी’ कह कर सम्बोधित किया। ’भामिनी’ शब्द अत्यन्त आदरणीय नारी के लिए प्रयोग किया जाता है। प्रभु राम ने कहा :----
“कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥”
- हे भामिनी! सुनो, मैं केवल प्रेम के रिश्ते को मानता हूँ। तुम कौन हो, तुम किस परिवार मैं पैदा हुईं, तुम्हारी जाति क्या है, यह सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम ही मुझे तुम्हारे द्वार पर लेकर आया है।
लोक परंपराओं के अनुसार ,श्रमणी के पिता भीलों के मुखिया थे ! शबरी जब विवाह के योग्य हुई तो उसके पिता ने उसका विवाह तय किया। उस समय विवाह में जानवरों की बलि देने का नियम था, शबरी के विवाह के लिए भी बकरे-भैंसे बलि के लिए इकट्ठे किये गए। जब शबरी ने अपने पिता से पूछा- ‘ये सब जानवर क्यों इकट्ठे किये गये हैं?’ पिता ने कहा- ‘तुम्हारे विवाह के उपलक्ष में इन सब की बलि दी जाएगी। यह सुनकर बालिका शबरी का मन बहुत दुखी हुआ, और वह विवाह से एक दिन पहले ही रात के समय घर से भाग गई।भाग कर वे दण्डकारण्य पहुंच गईं |वहाँ मातंग ऋषि को तपस्यारत देख कर वे मौनभाव से उनके आश्रम को झाड़ने -बुहारने में जुट गईं | उसके निष्काम सेवाभाव के कारण ऋषि नें अपने ही आश्रम में उसके आवास की स्वीकृति दे दी| मतंग ऋषि की शिष्या बनने के बाद उसने अपना पूरा जीवन रामभक्ति में लगा दिया।
हम सब इस कथा से परिचित हैं कि वनवास के समय राम-लक्ष्मण ने शबरी का आतिथ्य स्वीकार किया था और उसके द्वारा प्रेम पूर्वक दिए हुए कन्दमूल फ़ल खाये | राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी नें लिखा है :-----
"कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहूं आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि ।"
वास्तव में शबरी को रामचरितमानस में कहीं भी झूठे बेर खिलाते हुए वर्णित नहीं किया गया है। शबरी तो अत्यंत रस भरे कंदमूल फल राम के सम्मुख रखती हैं और राम प्रेम सहित उनका बखान कर, उनकी प्रशंसा कर बार-बार उन्हें खाते हैं।
अपने आराध्य को सामने देखकर , दोनों हाथों को जोड़कर जब शबरी भक्तों के रूप में अपनी अयोग्यता का वर्णन करती हैं तब
"कह रघुपति सुनु भामिनी बाता।
मानउँ एक भगति कर नाता।।"
कहकर उसे नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं और उसकी भक्ति की प्रशंसा कर जनकसुता के विषय में जानकारी देते हैं और शबरी उन्हें सुग्रीव से मित्रता कर लक्ष्य प्राप्ति के लिए पंपा सरोवर से आगेजाने का मार्ग बताती हैं।।
वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड के ७३वें सर्ग में दानव रूप धारी कबंध जब अपनी मुक्ति के पश्चात दिव्य रूप धारण करता है तब वह सीता की खोज के लिए उन्हें पश्चिम दिशा की ओर आगे बढ़ने को कहता है जहां पंपा नाम की पुष्करिणी है। वहां पहले मतंग मुनि के शिष्य ऋषिगण निवास करते थे परंतु अब ऋषि तो गोलोकवासी हो गए किंतु शबरी वही रह कर धार्मिक अनुष्ठानों में लगी रहती है। वहां का जंगल मतंग वन के नाम से प्रसिद्ध है जो नंदनवन के समान है। पंपा सरोवर के पूर्व भाग में ऋष्यमूक पर्वत हैं जहां की गुफा में निवास करने वाले सुग्रीव से वे अवश्य मित्रता करें।
कबंध के बताए हुए पंपा सरोवर पहुंचकर दोनों भाइयों ने शबरी का रमणीय आश्रम देखा। उस सुरम्य आश्रम में वे शबरी से मिले। महर्षि वाल्मीकि कहते हैं शबरी सिद्ध तपस्विनी थी। उसने दोनों भाइयों को अपने आश्रम पर उपस्थित देखकर प्रणाम किया फिर पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदि के लिए सामग्री समर्पित कर उनका विधिवत सत्कार किया। शबरी ने पंपा तट पर उत्पन्न होने वाले नाना फलों व कंदमूलों को श्रीराम-लक्ष्मण को समर्पित करते हुए बताया कि इनका संग्रह वह उनके ही स्वागत के लिए कर रही थी क्योंकि उनके यशस्वी गुरु महर्षि मतंग ने स्वर्ग धाम जाने से पहले इस आश्रम में रघुनंदन के आगमन की बात बताई थी।
" एवमुक्त: स धर्मात्मा शबर्या शबरीमिदम्।
राघवः प्राह विज्ञाने तां नित्यमबहिष्कृताम् ।। (१८)
अर्थात शबरी समाज से दूर रहने पर भी विज्ञान से दूर नहीं थी परमात्मा तत्व का नित्य ज्ञान उन्हें प्राप्त था। उसकी पूर्व उक्त बातें सुनकर राघव ने ऐसा कहा।
तत्पश्चात उसने दोनों भाइयों को मतंगवन के आश्चर्यचकित करने वाले कई स्थानों का दर्शन करवाया । इन स्थानों में तपस्या के प्रभाव से देव अर्चना के लिए गुरुजनों द्वारा बनाई गई मालाओं के ना तो फूल मुरझाए थे, ना ही वृक्षों पर स्नान के बाद फैलाए गए उनके गीले वल्कल सूखे थे । सप्त सागर तीर्थ में महर्षि के चिंतन मात्र से प्रकट हुआ सातों समुद्रों का जल था। मतंगवन के अतुलनीय सौंदर्य के दर्शन करवा कर शबरी ने अपनी देह का परित्याग कर पवित्रतात्मा ऋषियों के समीप जाने की इच्छा प्रकट की तो शबरी के धर्मयुक्त वचनों को सुनकर लक्ष्मण सहित श्री राम के मुंह से निकल पड़ा "आश्चर्य है! " तदनंतर श्री राम जी चंद्र से आज्ञा पाकर मस्तक पर जटा, शरीर पर चीर और काला मृगचर्म धारण करने वाली शबरी ने अपने को योगाग्नि में होम कर प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी शरीर प्राप्त किया। वह दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण, दिव्य पुष्पों की माला और दिव्य अनुलेपन धारण किए बड़ी मनोहर दिखाई देने लगी तथा सुदाम पर्वत पर प्रकट हुई बिजली के सामान उस प्रदेश को प्रकाशित करती हुई स्वर्ग लोक चली गई। उसने अपने चित्त को एकाग्र करके उस पुण्य धाम की यात्रा की जहां उसके गुरुजन पुण्यात्मा महर्षि विहार करते थे!
यत्र ते सुकृतात्मानो विहरन्ति महर्षयः ।
तत् पुण्यं शबरी स्थानं जगामात्मसमाधिना।। (३५)
अपने तेज से प्रकाशित होने वाली शबरी के दिव्य लोक में चले जाने पर भाई लक्ष्मण सहित धर्मात्मा रघुनाथ जी ने उन महात्मा महर्षियों के प्रभाव का चिंतन किया और कहा कि हमने पुण्यात्मा महर्षियों का यह पवित्र आश्रम देखा। यहां बहुत सी आश्चर्यजनक बातें हैं। यहां हरिण और सिंह एक दूसरे पर विश्वास करते हैं।यहां जो सातों समुद्रों के जल से भरे हुए तीर्थ हैं उनमें हमने विधि पूर्वक स्नान और पितरों का तर्पण किया इससे हमारा सारा अशुभ नष्ट हो गया अब हमारे कल्याण का समय उपस्थित हो रहा है।
शबरी चरित्र का उल्लेख रामायण, भागवत, रामचरितमानस, सूरसागर, साकेत आदि ग्रंथों में भी है। पौराणिक विषयों पर चित्रों के लिये प्रसिद्ध चित्रकार नन्दलाल बोस ने भी शबरी को चित्रित किया है।
वास्तव में त्रेतायुग की शबरी के चरित में आधुनिक युग तक की यात्रा में लोक परंपरा नें कई आयामों को जोड़कर सिद्ध तपस्विनी शबरी को शबरीमाता बनाकर जो अमरत्व प्रदान किया वह हमारी अमूल्य विरासत की कथा है।

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