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सोमवार, 29 दिसंबर 2025

*अरुणाचलम के प्रसिद्ध योगी:श्री महर्षि रमण *

🇮🇳भारतीय स्वतंत्रता का अमृत काल 🪷
🕉️बीसवीं शताब्दी के महान संत महर्षि रमण के जन्मदिवस पर कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धासुमन 🪷🪷।
इन दिनों 🔥कार्तिगाई दीपम प्रज्ज्वलित करने को लेकर हुए अनर्गल विवाद जिन आस्थाओं के प्रति प्रश्नचिह्न लगा रहे थे। उसी पावन दीपज्योति नें,सहस्राब्दियों के अपने जाज्वल्यमान प्रकाश से, अरुणाचलेश्वर (अनादि भगवान शिव ) के मूर्तिमन्त स्वरूप से उत्प्रेरणा लेकर अनेक आध्यात्मिक गुरुओं नें वर्तमान में मानवता का मार्गदर्शन किया है। 
कार्तिगाई दीपम की परम्परा अति प्राचीन है। पुरातन ग्रंथों में इसके उल्लेख मिलते हैं। तमिल साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ 'अहनानुरु' में इस *प्रकाश पर्व *का उल्लेख मिलता है जो "संगम साहित्य" की महान कृतियों में से एक है और इसमें २ ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से ३०० ईस्वी के मध्य घटित हुई घटनाओं का वर्णन है। संगम युग की प्रसिद्ध प्रसिद्ध कवयित्री और संत अव्वैयार जी ने भी अपनी कविताओं में *कार्तिगाई दीपम * का उल्लेख किया है। पूर्ववर्ती संगम-साहित्य में इस त्यौहार को *पेरुविला* के नाम से भी जाना जाता रहा है । (वर्ष१९९१ में, शुक्र ग्रह पर २०.६ कि.मी चौड़े क्रेटर को अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ द्वारा *अव्वियार क्रेटर* नाम दिया गया था । उनका कथन - "आपने जो सीखा है वह मुट्ठी भर है!आपने जो नहीं सीखा है वह दुनिया के बराबर है!" को 'नासा' के 'कॉस्मिक प्रश्न प्रदर्शनी' में सम्मिलित  किया गया।)- - - - कहने का अर्थ यह है कि यह ऐतिहासिक प्रमाण *कार्तिगाई दीपम* की पुरातन विरासत का उद्घोषक है।  
महर्षि रमण का कार्तिगाई दीपम से गहरा संबंध है ।तिरुवन्नामलाई में अरुणाचल पर्वत पर प्रकाशित होने वाला यह विशाल प्रदीप, महर्षि के लिए आध्यात्मिक रूप से भगवान   शिव का स्वरूप रहा। उनका मानना था कि कार्तिगाई दीपम का वास्तविक अर्थ है - '' मैं शरीर हूँ के विचार से आगे बढ़कर आंतरिक प्रकाश (आत्मा) का अनुभव करना, जो कि हृदय में समाधि के माध्यम से संभव है।" उन्होंने स्वयं कहा कि इस पर्व का महत्व 'मन को भीतर मोड़कर हृदय में विलीन करना'  है।यह महर्षि रमण जी की तपस्या स्थली है। महर्षि रमण स्वयं को और अरुणाचल पर्वत को एक ही वास्तविकता मानते थे, और इस पर्व पर सभी भक्त इस पहाड़ी की ज्योति को देखकर स्वयं के भीतर के शाश्वत, अद्वैत आत्मा के दिव्य प्रकाश से जुड़ जाते हैं।
महर्षि रमण जी का जन्म ३० दिसम्बर १८७९ को तिरुचुली ,तमिलनाडु में, वकील सुंदरम्‌ अय्यर और अलगंमाल के पुत्ररत्न के रूप में हुआ था। उनका नाम वेंकटरामन रखा गया था। वर्तमान समय में,  वैदिक संस्कृति की बीसवीं शताब्दी में पुनः प्राण प्रतिष्ठा करने वाले संत के रूप में महर्षि रमण जी का स्मरण किया जाता है।  उन्होंने अपने कठिन तप से ज्ञान और आत्मा की खोज की और उसे जागृत किया, उनके हृदय में जीव-जंतु और संसार रूपी इस दुनिया में सभी के प्रति दया भाव था। सभी के हित को लेकर चिंतन भी करते थे। 
सम्पूर्ण विश्व में, "अरुणाचल के प्रसिद्ध योगी, श्री महर्षि रमण "के नाम से प्रख्यात संत के अनुसार "कार्तिगाई दीपम "वह दिन है जब भगवान शिव अरुणाचल पहाड़ी पर 'ज्योति पुंज' (अग्नि के स्तंभ) के रूप में प्रकट हुए थे। महर्षि रमण अरुणाचल को अपना गुरु और साक्षात शिव का रूप मानते थे।यही तिरूवन्नामलाई, महर्षि रमण जी का निवास था। इस पवित्र पर्वत की विरूपाक्षी गुफा में उन्होंने वर्षों कठोर तप किया है। मुझे स्मरण आती है उनसे जुड़ी लिखित घटना - - - - पवित्र पर्वत अरूणाचलम् एवं इसकी तलहटी में बने आश्रम परिसर में सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक 'कार्लगुस्ताव जुंग 'नें, 'अन्नामलाई स्वामी' से भेंट कर अपने प्रश्नों के सटीक उत्तर पाए थे।
यह वर्ष १९३८ की बात है -  - सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्लगुस्ताव जुंग नें, भारत एवं भारतीय आध्यात्मिक साहित्य के बारे में काफी कुछ पढ़ा था। आध्यात्मिक जिज्ञासा की प्रबलता के साथ उनमें वैज्ञानिक अभिवृत्ति भी दृढ़ थी। वे आध्यात्मिक सत्यों को वैज्ञानिक रीति- नीति से अनुभव करना चाहते थे। यही जिज्ञासु भाव उन्हें भारत भूमि की ओर आकृष्ट कर खींच रहा था। इसी समय सन् १९३८ के प्रारंभ में उन्हें भारत वर्ष की अंग्रेज सरकार की ओर से भारत आने के लिए आमंत्रण मिला।महर्षि रमण के नाम से प्रभावित जुंग, तिरूवन्नामलाई के लिए चल पड़े। कार्लगुस्ताव जुंग नें शाम को महर्षि से मुलाकात की। महर्षि उस समय शरीर पर केवल कौपीन धारण किए हुए थे। अपनेपन से भरे उनके चेहरे पर बालसुलभ निर्दोष हँसी और आध्यात्मिक प्रकाश था। प्रख्यात् मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग को महर्षि अपने से लगे। हालांकि उनके मन में शंका भी उठी कि ये साधारण दिखने वाले महर्षि क्या उनके वैज्ञानिक मन की जिज्ञासाओं का समाधान कर पाएँगे ? उनके मन में आए इस प्रश्र के उत्तर में महर्षि ने हल्की सी मीठी हंसी के साथ कहा- भारतीय प्राचीन ऋषियों कीआध्यात्म विद्या सम्पूर्णतः वैज्ञानिक है। आधुनिक वैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक चिन्तन-चेतना के लिए इसे वैज्ञानिक अध्यात्म कहना ठीक रहेगा। इसके मूलतत्त्व पांच हैं : - - - - १)जिज्ञासा- इसे तुम्हारी वैज्ञानिक भाषा में शोध समस्या भी कह सकते हैं।
२) प्रकृति एवं स्थिति के अनुरूप सही साधना विधि का चयन। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे अनुसन्धान विधि भी कह सकते हैं। 
३) शरीर मन की विकारविहीन प्रयोगशाला में किए जाने वाले त्रुटिहीन साधना प्रयोग। वैज्ञानिक ढंग से कहें तो नियंत्रित स्थति में की जाने वाली वह क्रिया प्रयोग है, जिसमें सतत् सर्वेक्षण किया जाता है, Experiment is observation of any action under control conditions. उन्होंने मधुर अंग्रेजी भाषा में अपने कथन को दुहराया। 
४) किए जा रहे प्रयोग का निश्चित क्रम से परीक्षण एवं सतत् ऑकलन। 
 ५)एवं अन्तिम इन सबके परिणाम में सम्यक् निष्कर्ष। 
महर्षि ने मृदुल- मधुर सहज स्वर में अपनी बातें पूरी की।  कार्ल जुंग सन्तुष्ट थे । 
महर्षि नें यह भी स्पष्ट किया-- “ मेरे आध्यात्मिक प्रयोग की वैज्ञानिक जिज्ञासा थी- मैं कौन हूँ ? इसके समाधान के लिए मैंने मनन एवं ध्यान की अनुसंधान विधि का चयन किया। इसी अरूणाचलम् पर्वत की विरूपाक्षी गुफ़ा में शरीर व मन की प्रयोगशाला में मेरे प्रयोग चलते हैं। इन प्रयोगों के परिणाम में अपरिष्कृत अचेतन परिष्कृत होता गया। चेतना की नयी- नयी परतें खुलती गयी।इनका मैंने निश्चित कालक्रम में परीक्षण व आकलन किया और अन्त में मैं निष्कर्ष पर पहुँचा, मेरा अहं आत्मा में विलीन हो गया। बाद में आत्मा-परमात्मा से एकाकार हो गयी। अहं के आत्मा में स्थानान्तरण ने मनुष्य को भगवान् में रूपान्तरित कर दिया। 
कार्ल जुंग के चेहरे पर पूर्ण प्रसन्नता और गहरी सन्तुष्टि के भाव थे।वैज्ञानिक अध्यात्म के मूल तत्त्व उन्हें समझ में आ चुके थे। 
महर्षि रमण से इस भेंट के बाद जब भारत से वापस लौटे तब वर्ष १९३८ में उन्होंने येले विश्वविद्यालय में अपना  व्याख्यान दिया “मनोविज्ञान एवं धर्म ”। इसमें उन्होंने अपने नए दृष्टिकोण का परिचय था।बाद में उनकी विचारधारा में जो भी बदलाव आए हों परंतु अपनी पुस्तक  “ श्री रमण एण्ड हिज़ मैसेज टु मॉडर्न मैन ’’ के प्राक्कथन में अपनी ओर से लिखा- “ श्री रमण भारत भूमि के सच्चे पुत्र हैं। वे अध्यात्म की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति के प्रकाशपूर्ण स्तम्भ हैं और साथ में कुछ अद्भुत भी। उनके जीवन एवं शिक्षा में हमें पवित्रतम् भारत के दर्शन होते हैं, जो समूची मानवता को वैज्ञानिक अध्यात्म के मूलमन्त्र का सन्देश दे रहा है।” 
महर्षि रमण जी नें जीवन के हर प्रश्न का उत्तर इतने सरल भाव से दिया है कि हमारी सारी शंकाओं का समाधान सहज ही हो जाता है।
रमण महर्षि जी ने कहा है कि हमारा वास्तविक स्वभाव शांत और आनन्दमय होता है। जैसे एक झील के नीचे का हिस्सा हमेशा शांत रहता है, वैसे ही हमारा सच्चा स्वभाव शांत और प्रसन्न रहने का है। कभी-कभी हमारे विचारों में भले ही हलचल हो। हम शांत रहकर आंतरिक आनन्द शांति को अनुभव कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आनन्द सबसे महत्वपूर्ण भावना है, और प्रसन्न रहने के लिए हमें अपने सच्चे रूप को जानना चाहिए। इसके लिए स्वयं से प्रश्न करने का निरन्तर अभ्यास आवश्यक है।
 महान संत महर्षि  रमण जी के पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन 🙏🪷🪷 स्वर्णअनिल।

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