नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!! नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!! नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!!
हर बार की तरह फिर वही यक्षप्रश्न - - - - क्या आप अंग्रेजी नववर्ष पर शुभकामनाएँ देंगी?
आप तो भारत पर हुए औपनिवेशिक "सांस्कृतिक आक्रमण" को राजनैतिक आक्रमण से बड़ा मानती हैं फिर न्यू ईयर - - - -?
आप तो भारतीय नव वर्ष को मानती और मनाती हैं!"
प्रकृति के नव-सृजन को, सृष्टि के नव- निर्माण को.... नव-पल्लवों की कोमल हथेलियों पर रचकर, अमराईयों में कूकती कोयल की तान में बसकर.... नव-उल्लास, नव-आशा, नव-जागरण की पावन ज्योति जगत के कण-कण में जगाने वाले भारतीय - नववर्ष में हमारे उत्सवधर्मी संस्कृति जीवंत हो उठती है। एक सत्य और है - - - -हम भोर के उजालों भरी पावन वेला में भारतीय नववर्ष मनाते हैं अर्द्धरात्रि में नहीं!
सच बात यह है कि मैं हिमाचल प्रदेश की बेटी हूं इसलिए बचपन से ही "विषु-साज्जे" , अर्थात बैसाखी को नववर्ष मनाती आई हूं।बंगाल में इस दिन को ‘नाबा वैशाख’ या ‘पौला बौशाख’, केरल में ‘विशु’, असम में ‘‘बोहाग बिहू’, पंजाब में ‘बैसाखी ’, उड़ीसा में ‘पाना संक्रांति’, तमिलनाडु में ‘पुथांडु ’, बिहार में ‘सतुआनि’ और ‘जुड़ी शीतल’ के नाम से मनाया जाता है।
विक्रमी संवत का चैत्र का महीना है जो समस्त भारतीय जनमानस के लिए शुभता का प्रतीक है, हमारे **** भारतीय सौर पंचांग, विक्रम संवत् का पहला महीना है जिसे न केवल देश भर में, बल्कि इस उपमहाद्वीप के बाहर बाली, थाईलैंड आदि देशों में भी नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। राशि चक्र की पहली राशि मेष में सूर्य के प्रवेश के साथ आरंभ चैत्र में एक नई ऋतु का आगमन होता है।मेरा मानना है कि यह मास हमारी कृषि प्रधान परंपरा का ऊर्जस्वी प्रतीक भी है इसीलिए इस मास में शक्ति की पूजा होती है जो मनुष्य की अंतर्निहित चेतना को जाग्रत और अभिव्यक्त करने वाली पराशक्ति भगवती दुर्गा का नमन करने की हमारी चिरंतन संस्कृति का परिचायक है। हमारा भारतीय नववर्ष, धरती के प्रकृति द्वारा किए गए श्रृंगार से सजे इसी महीने से प्रारंभ होता है।
इसके विपरीत अंग्रेज़ी महीने, काल गणना पर कम और व्यक्तिगत अहंकार की तुष्टि से अधिक जुड़े हैं!
आप सभी परिचित होंगे किस तरह ३१दिन वाले जूलियस सीज़र के नाम के महीने के एकदम बाद आगस्टस नें, अपने नाम वाले महीने में भी ३० की जगह ३१ दिन कर दिए। पोप ग्रेगेरियन (रोम के १३वें पोप) नें तो तब प्रचलित जूलियन कैलेंडर के ईसवी सन् १५८२ में नेपुलस् के ज्योतिषी एलाय सियस लिलियस (Aloysitus lilius) के परामर्श से १५८२ ईस्वी में ५ अक्टूबर को (१० दिन जोड़कर), अक्टूबर की १५ वीं तिथि घोषित कर, निश्चित किया। इस तरह कैलेंडर में १० दिन जोड़ कर - - - - वर्तमान वाला कैलेंडर चलाया गया ?
इस नवीन पद्धति (नये कैलेंडर) को ईसाई धर्मावलंबी राष्ट्रों नें अलग - अलग वर्षों में अपनाया----
१५८२ ई. में इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल नें ! प्रशिया, जर्मनी के रोमन कैथोलिक प्रदेश स्विट्जरलैंड, हॉलैंड और फ़्लैंडर्स ने १५८४ ई॰ में!
पोलैंड ने १५८६ ई॰ में!
हंगरी ने १५८७ ई॰ में!
जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश तथा डेनमार्क ने १७०० ई॰ में !
ब्रिटिश साम्राज्य ने १७५२ ई॰ में,
जापान ने १९७२ ई॰ में !
चीन ने १९१२ ई॰ में! बुल्गारिया ने १९१५ ई॰ में! तुर्की और सोवियत रूस ने १९१७ ई॰ में !
युगोस्लाविया और रोमानिया ने १९१९ ई॰ में अपनाया।
साम्राज्यवादी ईसाई देशों शक्तियों नें जहां भी अपने उपनिवेश स्थापित किए, उन देशों पर अपना कैलेंडर ज़बरदस्ती लाद दिया !!!!
यह उनके अहंकार की तुष्टि थी परंतु स्वतन्त्र भारत की राजनैतिक सत्ता नें विशुद्ध वैज्ञानिक पद्धति के भारतीय पंचांग को दरकिनार कर, एक नहीं कई विसंगतियों से भरे पाश्चात्य नववर्ष को क्यों स्वीकारा ?----हम नहीं जानते।।
भारत में कंपकंपाती ठंड से शुरू होता है- - - - ये ग्रैगेरियन कैलेंडर का "न्यू ईयर "!!
आइए, अब ज़रा सेप्टेंबर से दिसंबर तक के अंकों की गणना अर्थात गिनती भी कर लें। सितंबर (लैटिन सेप्टम से, "सात") या सितंबर मूल रूप से (प्राचीन "रोमन कैलेंडर" जो दस महीनों का था) में सातवां था। प्राचीन "रोमन कैलेंडर" भी विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की तरह मार्च माह, मार्शियस से शुरू हुआ था (मंगल के महीने) " ऑक्टो, रोमन "आठ" के लिए। "नौवेम, रोमन के लिए "नौ और दिसंबर का नाम डेसेम से आया है। लैटिन "दस" के लिए प्रयुक्त होता है।
(September (from Latin septem, "seven") or September was originally the seventh of ten months. On the ancient "Roman calendar" that began with March Martius, "Mars' month".
-octo, Latin for “eight. "novem, Latin for “nine. December's name come from decem, Latin for “ten."-)
इस प्रकार ग्रेगेरियन कैलेंडर के नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें महीने के लिए प्रयुक्त होने वाले नाम, अपने वास्तविक अर्थो में सात, आठ, नौं और दस अंक हैं। अर्थात बारहवें को दसवां महीना बताकर बने बारह महीनों के कैलेंडर को हमनें अपने ज्योतिष की प्रामाणिक गणनाओं, सूर्य-चंद्र व राशियों पर आधारित (पंचांग) अर्थात भारतीय कैलेंडर के स्थान पर क्यों अपनाना चाहते हैं ?
पूर्णतः वैज्ञानिक भारतीय पंचांग (कैलेंडर) में तो मासों का नामकरण भी प्रकृति के मानक नक्षत्रों पर आधारित है।
चित्रा नक्षत्र वाली पूर्णिमा के मास का नाम चैत्र है। विशाखा का वैखाख है। ज्येष्ठा का ज्येष्ठ है। आषाढ़ की पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढ़ा दो नक्षत्रों में से एक रहता है। श्रवण नक्षत्र का मास श्रावण है।उत्तराभद्रपद का भाद्रपद है। अश्विनी का अश्विन है। कृतिका का कार्तिक है। मृगशिरा का मार्गशीर्ष। पुष्य का पौष। मघा का माघ और जब पूर्णिमा को पूर्वाफाल्गुनी या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होता है तो फाल्गुन मास होता है।
इसी तरह भारत में ३५४ दिन के बाद वर्ष और ३६५ दिन ६ घंटे ९ मिनट ११ सैकेंड के अंतर को दूर करने के लिए भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने २ वर्ष ८ मास १६ दिन के उपरांत एक अधिक मास (पुरुषोत्तम/मलमास) की व्यवस्था करके कालगणना के साथ प्रकृति की शुद्धता व वैज्ञानिकता को संतुलित किया है।
उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में यही उचित होगा कि हम सभी भारतवासी पूर्णतः वैज्ञानिकता और प्रकृति के नियमों पर आधारित अपनी युगों की वैज्ञानिक भारतीय कालगणना का प्रयोग करें।
- - - - औपनिवेशिकता के कारण थोपी गई इस अवैज्ञानिक परंपरा का सत्य हमें समझना होगा!
पर हम सब जानते हैं कि किसी भी सत्य को जानने, तथ्य को मानने और - - - - कार्यरूप में बदलने में 🙄 बहुत बड़ा अंतर होता है !! औपनिवेशिक सत्ता द्वारा थोपे गए जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा हमारे स्वाधीन भारतवर्ष के स्वतंत्रता अमृतकाल में जनता के बहुमत से ही हटाई जा सकती है !!!!
मेरा निजी दृष्टिकोण यह है कि अपनी संस्कृति व वैज्ञानिक विरासत के प्रति हमारी निष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।संवैधानिक स्तर पर स्वीकृति के साथ कार्यरूप में जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा को भारतवर्ष से, जनमानस में वैज्ञानिक जागृति व अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति जागरूकता द्वारा ही हटाया जा सकता है !!!!
हम नववर्ष के दिन को उन देशों को शुभकामना संदेश देकर अवश्य मनाऐंगे जो ग्रेगेरियन मान्यता को नववर्ष के रूप में स्वीकारते हैं। जबकि हम वहां के मौसम, पेड़-पौधों और प्राणियों की स्थितियों के भी साक्षी हैं ।
इन ईसाई देशों में से साम्राज्यवादी शक्तियों नें जहां भी अपने उपनिवेश स्थापित किए, उन देशों पर अपना कैलेंडर ज़बरदस्ती लाद दिया !!!!
वैज्ञानिक पद्धति के भारतीय पंचांग को दरकिनार कर,
एक नहीं कई विसंगतियों से भरा ये नववर्ष , भारत में भी कंपकंपाती ठंड से शुरू होता है- - - - ये ग्रैगेरियन कैलेंडर का "न्यू ईयर "!!
आइए, अब ज़रा सेप्टेंबर से दिसंबर तक के अंकों की गणना अर्थात गिनती भी कर लें। सितंबर (लैटिन सेप्टम से, "सात") या सितंबर मूल रूप से (प्राचीन "रोमन कैलेंडर" जो दस महीनों का था) में सातवां था। प्राचीन "रोमन कैलेंडर" भी विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की तरह मार्च माह, मार्शियस से शुरू हुआ था (मंगल के महीने) " ऑक्टो, रोमन "आठ" के लिए। "नौवेम, रोमन के लिए "नौ और दिसंबर का नाम डेसेम से आया है। लैटिन "दस" के लिए प्रयुक्त होता है।
(September (from Latin septem, "seven") or September was originally the seventh of ten months. On the ancient "Roman calendar" that began with March Martius, "Mars' month".
-octo, Latin for “eight. "novem, Latin for “nine. December's name come from decem, Latin for “ten."-)
इस प्रकार ग्रेगेरियन कैलेंडर के नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें महीने के लिए प्रयुक्त होने वाले नाम, अपने वास्तविक अर्थो में सात, आठ, नौं और दस अंक हैं। अर्थात बारहवें को दसवां महीना बताकर बने बारह महीनों के कैलेंडर को हमनें अपने ज्योतिष की प्रामाणिक गणनाओं, सूर्य-चंद्र व राशियों पर आधारित (पंचांग) अर्थात भारतीय कैलेंडर के स्थान पर क्यों अपनाना चाहते हैं ?
पूर्णतः वैज्ञानिक भारतीय पंचांग (कैलेंडर) में तो मासों का नामकरण भी प्रकृति के मानक नक्षत्रों पर आधारित है।
चित्रा नक्षत्र वाली पूर्णिमा के मास का नाम चैत्र है। विशाखा का वैखाख है। ज्येष्ठा का ज्येष्ठ है। आषाढ़ की पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढ़ा दो नक्षत्रों में से एक रहता है। श्रवण नक्षत्र का मास श्रावण है।उत्तराभद्रपद का भाद्रपद है। अश्विनी का अश्विन है। कृतिका का कार्तिक है। मृगशिरा का मार्गशीर्ष। पुष्य का पौष। मघा का माघ और
जब पूर्णिमा को पूर्वाफाल्गुनी या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होता है तो फाल्गुन मास होता है।
इसी तरह भारत में ३५४ दिन के बाद वर्ष और ३६५ दिन ६ घंटे ९ मिनट ११ सैकेंड के अंतर को दूर करने के लिए भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने २ वर्ष ८मास १६ दिन के उपरांत एक अधिक मास या पुरुषोत्तम अथवा मलमास की व्यवस्था करके कालगणना के साथ प्रकृति की शुद्धता और वैज्ञानिकता को संतुलित किया है।
उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में यही उचित होगा कि हम सभी भारतवासी पूर्णतः वैज्ञानिकता और प्रकृति के नियमों पर आधारित अपनी युगों की वैज्ञानिक एवं वैश्विक भारतीय कालगणना का प्रयोग करें।
- - - - औपनिवेशिकता के कारण थोपी गई इस अवैज्ञानिक परंपरा का सत्य समझें?
पर हम सब जानते हैं कि किसी भी सत्य को जानने, तथ्य को मानने और - - - - कार्यरूप में बदलने में 🙄 बहुत बड़ा अंतर होता है। औपनिवेशिक सत्ता द्वारा थोपे गए जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा हमारे स्वाधीन भारतवर्ष के स्वतंत्रता अमृतकाल में जनता के बहुमत से ही हटाई जा सकती है !!!!
मेरा निजी दृष्टिकोण यह है कि अपनी संस्कृति व वैज्ञानिक विरासत के प्रति हमारी निष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।संवैधानिक स्तर पर स्वीकृति के साथ कार्यरूप में जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा को भारतवर्ष से, जनमानस में वैज्ञानिक जागृति व अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति जागरूकता द्वारा ही हटाया जा सकता है !!!!
हम नववर्ष के दिन को उन देशों को शुभकामना संदेश देकर अवश्य मनाऐंगे जो ग्रेगेरियन मान्यता को नववर्ष के रूप में स्वीकारते हैं।
प्रसन्नताओं के लिए, खुशियों के लिए द्वार बंद करने की परंपरा भारतीय संस्कृति में सिखाई ही नहीं जाती। अतः सबको नववर्ष की आरोग्यता , सुख, समृद्धि , शांति और सकारात्मकता भरी शुभकामनाएँ।
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