जाड़ों का मौसम

जाड़ों का मौसम
मनभावन सुबह

लोकप्रिय पोस्ट

लोकप्रिय पोस्ट

Translate

लोकप्रिय पोस्ट

बुधवार, 31 दिसंबर 2025

भारतीय संस्कृति के उन्नायक : कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी जी।

🇮🇳 भारतीय स्वतंत्रता का अमृत काल 🪷🪷
🇮🇳 भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता के उन्नायक"श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी" को श्रद्धाँजलि 🪷🪷
स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, कानून विशेषज्ञ, साहित्यकार तथा शिक्षाविद मुंशी जी (२९ दिसंबर,१८८७ - ८फरवरी, १९७३) महर्षि श्री अरविन्द जी के प्रभाव से,परतन्त्र भारत की स्वतंत्रता हेतु क्रांतिकारी आन्दोलन की ओर झुके। मुंबई में बसने के बाद, वे 'भारतीय होमरूल आंदोलन' में शामिल हो गए और १९१५ में इसके सचिव बने। १९२७ में, वे बॉम्बे विधान सभा के लिए चुने गए, लेकिन 'बारदोली सत्याग्रह' के बाद उन्होंने इससे त्याग पत्र दे दिया था। स्वाधीनता संग्राम में अपने योगदान के लिए उन्होंने दो वर्ष जेल में बिताए। मुंशी जी वर्ष १९३७ के बॉम्बे प्रेसीडेंसी चुनाव में चयनित होकर वहां के गृह मंत्री बने। गृहमंत्री के रूप में उन्होंने बॉम्बे में सांप्रदायिक दंगों को दबाया। वर्ष १९४० में 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' में भाग लेने के बाद मुंशी को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। 
मुंशी जी अगस्त १९४७ में भारत के राष्ट्रध्वज का चयन करने वाली तदर्थ ध्वज समिति में थे और डॉ अंबेडकर जी की अध्यक्षता में भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के सदस्य भी थे।राजनीतिज्ञ और शिक्षक होने के अलावा मुंशी एक पर्यावरणविद् भी थे राष्ट्रीय शिक्षा के समर्थक थे। वे पश्चिमी शिक्षा के अंधानुकरण का विरोध करते थे। मंत्री के रूप में   वन महोत्सव का शुभारंभ उन्होंने आरंभ किया था।   वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे थे। भारत सरकार के खाद्य मंत्री पद पर रहे। स्वाधीनता से लगभग दस वर्ष पूर्व उन्होंने मुंबई में, नवम्बर, १९३८ में उन्होंने 'भारतीय विद्या भवन' की स्थापना की ताकि भारत के वर्तमान तथा भविष्य को भारत के सांस्कृतिक एवं वैचारिक पुनर्जागरण से संजोया जा सके। भारतीय विद्या भवन के आज सारे विश्व में लगभग १२० केंद्र और इनसे जुड़े हुए ३५० से अधिक शैक्षणिक संस्थान हैं।
"कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी का स्पष्ट कथन है कि " मेरे लिए भारतीय संविधान के पहली पंक्ति 'इण्डिया दैट इज़ भारत' वाक्यांश का अर्थ केवल एक भूभाग नहीं बल्कि एक अंतहीन सभ्यता है, ऐसी सभ्यता जो अपने आत्म-नवीनीकरण के ज़रिये सदैव जीवित रहती है।--भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान में कार्य करने की शक्ति मुझे अतीत के प्रति अपने विश्वास से ही मिली है। भारत की स्वतंत्रता अगर हमें 'भगवद्गीता से दूर करती है या हमारे करोड़ों लोगों के इस विश्वास या श्रध्दा को तोड़ती है, जो हमारे मंदिरों के प्रति उनके मन में है और हमारे समाज के ताने-बाने को तोड़ती है तो ऐसी स्वतंत्रता का मेरे लिए कोई मूल्य नहीं है। सोमनाथ मंदिर के पुनरुध्दार का जो सपना मैं हर रोज देखता आया हूं, उसे पूरा करने का मुझे गौरव प्राप्त हुआ है। इससे मेरे मन में यह एहसास और विश्वास उत्पन्न होता है कि इस पवित्र स्थल के पुनरुद्धार से हमारे देशवासियों की धार्मिक अवधारणा अपेक्षाकृत और शुध्द होगी तथा इससे अपनी शक्ति के प्रति उनकी सजगता और भी बढ़ेगी।"
स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी मुंशी जी  की प्रमुख कार्यसूची में था। उनकी इस सक्रियता के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने एक कैबिनेट बैठक के बाद कन्हैयालाल मुंशी से कहा था, "आप सोमनाथ मंदिर की पुनःस्थापना के लिए जो प्रयास कर रहे हैं, वे मुझे पसंद नहीं हैं।" 
१९५२ से १९५७ तक  उत्तर प्रदेश राज्य के राज्यपाल रहे  कन्हैयालाल मुंशी जी नें १९५९ में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र देकर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी को अपनाया ।  कुछ समय बाद उन्होंने भारतीय जनसंघ की सदस्यता ग्रहण कर ली।
प्रख्यात साहित्यकार के रूप में उन्होंने गुजराती, हिंदी व अंग्रेज़ी में सौ से ज्यादा उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की थी। इन्होंने मुंशी प्रेमचंद के साथ 'हंस' पत्रिका का संपादन भी संभाला था। ‘यंग इंडिया’ के संयुक्त सम्पादक और 'भवन्स जर्नल’ के सम्पादक रहे। सन् १९३८ से भारतीय विद्या भवन के आजीवन अध्यक्ष और ‘ सन् १९३७-५७ के मध्य, दस वर्षों तक गुजराती साहित्य परिषद के अध्यक्ष, सन् १९४४ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष। सन् १९५१ से मृत्युपर्यन्त संस्कृत विश्व परिषद के भी अध्यक्ष रहे। 
हिन्दी में उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं :---- ‘लोमहर्षिणी’, ‘लोपामुद्रा’, ‘भगवान परशुराम’, ‘तपस्विनी’, ‘पृथ्वीवल्लभ’, ‘भग्नपादुका’, ‘पाटण का प्रभुत्व’, कृष्णावतार के सात खंड—‘बंसी की धुन’, ‘रुक्मिणीहरण’, ‘पाँच पांडव’, ‘महाबली भीम’, ‘सत्यभामा’, ‘महामुनि व्यास’, ‘युधिष्ठिर’ (उपन्यास); ‘वाह रे मैं वाह’ (नाटक); ‘आधे रास्ते’, ‘सीधी चढ़ान’, ‘स्वप्नसिद्धि की खोज में’ (आत्मकथा के तीन खंड)।
आदरणीय मुंशी जी सांस्कृतिक एकीकरण के बिना किसी भी सामाजिक -राजनीतिक कार्यक्रम का कोई महत्व नहीं मानते थे।भारतीय संस्कृति के पुरोधा कन्हैयालाल माणिकलाल मुशी जी के जन्मदिवस पर कोटि-कोटि नमन व श्रद्धासुमन - - 🪷🪷🪷🪷🪷 स्वर्णअनिल।

नववर्ष की शुभकामनाएँ !!!!

नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!! नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!! नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!! 
हर बार की तरह फिर वही यक्षप्रश्न - - - - क्या आप अंग्रेजी नववर्ष पर शुभकामनाएँ देंगी?
आप तो भारत पर हुए औपनिवेशिक "सांस्कृतिक आक्रमण" को राजनैतिक आक्रमण से बड़ा मानती हैं फिर न्यू ईयर - - - -?
आप तो भारतीय नव वर्ष को मानती और मनाती हैं!" 
प्रकृति के नव-सृजन को, सृष्टि के नव- निर्माण को.... नव-पल्लवों की कोमल हथेलियों पर रचकर, अमराईयों में कूकती कोयल की तान में बसकर.... नव-उल्लास, नव-आशा, नव-जागरण की पावन ज्योति जगत के कण-कण में जगाने वाले भारतीय - नववर्ष में हमारे उत्सवधर्मी संस्कृति जीवंत हो उठती है। एक सत्य और है - - - -हम भोर के उजालों भरी पावन वेला में भारतीय नववर्ष मनाते हैं अर्द्धरात्रि में नहीं! 
सच बात यह है कि मैं हिमाचल प्रदेश की बेटी हूं इसलिए बचपन से ही "विषु-साज्जे" , अर्थात बैसाखी को नववर्ष मनाती आई हूं।बंगाल में इस दिन को ‘नाबा वैशाख’ या ‘पौला बौशाख’,  केरल में ‘विशु’, असम में ‘‘बोहाग बिहू’, पंजाब में ‘बैसाखी ’, उड़ीसा में ‘पाना संक्रांति’, तमिलनाडु में ‘पुथांडु ’, बिहार में ‘सतुआनि’ और ‘जुड़ी शीतल’ के नाम से मनाया जाता है।
विक्रमी संवत का चैत्र का महीना है जो समस्त भारतीय जनमानस के लिए शुभता का प्रतीक है, हमारे **** भारतीय सौर पंचांग, विक्रम संवत् का पहला महीना है जिसे न केवल देश भर में, बल्कि इस उपमहाद्वीप के बाहर बाली, थाईलैंड आदि देशों में भी नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। राशि चक्र की पहली राशि मेष में सूर्य के प्रवेश के साथ आरंभ चैत्र में एक नई ऋतु का आगमन होता है।मेरा मानना है कि यह मास हमारी कृषि प्रधान परंपरा का ऊर्जस्वी प्रतीक भी है इसीलिए इस मास में शक्ति की पूजा होती है जो मनुष्य की अंतर्निहित चेतना को जाग्रत और अभिव्यक्त करने वाली पराशक्ति भगवती दुर्गा का नमन करने की हमारी चिरंतन संस्कृति का परिचायक है। हमारा भारतीय नववर्ष, धरती के प्रकृति द्वारा किए गए श्रृंगार से सजे इसी महीने से प्रारंभ होता है।
इसके विपरीत अंग्रेज़ी महीने, काल गणना पर कम और व्यक्तिगत अहंकार की तुष्टि से अधिक जुड़े हैं! 
आप सभी परिचित होंगे किस तरह ३१दिन वाले जूलियस सीज़र के नाम के महीने के एकदम बाद आगस्टस नें, अपने नाम वाले महीने में भी ३० की जगह ३१ दिन कर दिए। पोप ग्रेगेरियन (रोम के १३वें पोप) नें तो तब प्रचलित जूलियन कैलेंडर के ईसवी सन् १५८२ में नेपुलस् के ज्योतिषी एलाय सियस लिलियस (Aloysitus lilius) के परामर्श से १५८२ ईस्वी में ५ अक्टूबर को (१० दिन जोड़कर), अक्टूबर की १५ वीं तिथि घोषित कर, निश्चित किया। इस तरह कैलेंडर में १० दिन जोड़ कर - - - - वर्तमान वाला कैलेंडर चलाया गया ?
 इस नवीन पद्धति (नये कैलेंडर) को ईसाई धर्मावलंबी राष्ट्रों नें अलग - अलग वर्षों में अपनाया----
 १५८२ ई. में इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल नें ! प्रशिया, जर्मनी के रोमन कैथोलिक प्रदेश स्विट्जरलैंड, हॉलैंड और फ़्लैंडर्स ने १५८४ ई॰ में!
पोलैंड ने १५८६ ई॰ में!
हंगरी ने १५८७ ई॰ में!
जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश तथा डेनमार्क ने १७०० ई॰ में !
ब्रिटिश साम्राज्य ने १७५२ ई॰ में,
जापान ने १९७२ ई॰ में !
चीन ने १९१२ ई॰ में! बुल्गारिया ने १९१५ ई॰ में! तुर्की और सोवियत रूस ने १९१७ ई॰ में !
 युगोस्लाविया और रोमानिया ने १९१९ ई॰ में अपनाया।
साम्राज्यवादी ईसाई देशों  शक्तियों नें जहां भी अपने उपनिवेश स्थापित किए, उन देशों पर अपना कैलेंडर ज़बरदस्ती लाद दिया !!!!
यह उनके अहंकार की तुष्टि थी परंतु स्वतन्त्र भारत की राजनैतिक सत्ता नें विशुद्ध वैज्ञानिक पद्धति के भारतीय पंचांग को दरकिनार कर, एक नहीं कई विसंगतियों से भरे पाश्चात्य नववर्ष को क्यों स्वीकारा ?----हम नहीं जानते।। 
भारत में  कंपकंपाती ठंड से शुरू होता है- - - - ये ग्रैगेरियन कैलेंडर का "न्यू ईयर "!! 
आइए, अब ज़रा सेप्टेंबर से दिसंबर  तक के अंकों की गणना अर्थात गिनती भी कर लें। सितंबर (लैटिन सेप्टम से, "सात") या सितंबर मूल रूप से (प्राचीन "रोमन कैलेंडर" जो दस महीनों का था) में सातवां था। प्राचीन "रोमन कैलेंडर" भी विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की तरह मार्च माह, मार्शियस से शुरू हुआ था (मंगल के महीने) " ऑक्टो, रोमन "आठ" के लिए। "नौवेम, रोमन के लिए "नौ और दिसंबर का नाम डेसेम से आया है। लैटिन "दस" के लिए प्रयुक्त होता है। 
(September (from Latin septem, "seven") or September was originally the seventh of ten months. On the ancient "Roman calendar" that began with March Martius, "Mars' month".
-octo, Latin for “eight. "novem, Latin for “nine. December's name come from decem, Latin for “ten."-) 
इस प्रकार ग्रेगेरियन कैलेंडर के नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें महीने के लिए प्रयुक्त होने वाले नाम, अपने वास्तविक अर्थो में सात, आठ, नौं और दस अंक हैं।  अर्थात बारहवें को दसवां महीना बताकर बने बारह महीनों के कैलेंडर को हमनें अपने ज्योतिष की प्रामाणिक गणनाओं, सूर्य-चंद्र व राशियों पर  आधारित (पंचांग) अर्थात भारतीय कैलेंडर के स्थान पर क्यों अपनाना चाहते  हैं ?
पूर्णतः वैज्ञानिक भारतीय पंचांग (कैलेंडर) में  तो मासों का नामकरण भी प्रकृति के मानक नक्षत्रों पर आधारित है।
चित्रा नक्षत्र वाली पूर्णिमा के मास का नाम चैत्र है। विशाखा का वैखाख है। ज्येष्ठा का ज्येष्ठ है। आषाढ़ की पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढ़ा दो नक्षत्रों में से एक रहता है। श्रवण नक्षत्र का मास श्रावण है।उत्तराभद्रपद का भाद्रपद है। अश्विनी का अश्विन है। कृतिका का कार्तिक है। मृगशिरा का मार्गशीर्ष। पुष्य का पौष। मघा का माघ और जब पूर्णिमा को पूर्वाफाल्गुनी या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होता है तो फाल्गुन मास होता है।
इसी तरह भारत में ३५४ दिन के बाद वर्ष और ३६५ दिन ६ घंटे ९ मिनट ११ सैकेंड के अंतर को दूर करने के लिए भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने २ वर्ष ८ मास १६ दिन के उपरांत एक अधिक मास (पुरुषोत्तम/मलमास) की व्यवस्था करके कालगणना के साथ प्रकृति की शुद्धता व वैज्ञानिकता को संतुलित किया है।
उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में यही उचित होगा कि हम सभी भारतवासी पूर्णतः वैज्ञानिकता और प्रकृति के नियमों पर आधारित अपनी युगों की वैज्ञानिक भारतीय कालगणना का प्रयोग करें। 
- - - -  औपनिवेशिकता के कारण थोपी गई इस अवैज्ञानिक परंपरा का सत्य हमें समझना होगा! 
पर हम सब जानते हैं कि किसी भी सत्य को जानने, तथ्य को मानने और - - - - कार्यरूप में बदलने में 🙄 बहुत बड़ा अंतर होता है !! औपनिवेशिक सत्ता द्वारा थोपे गए जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा हमारे स्वाधीन भारतवर्ष के स्वतंत्रता अमृतकाल में जनता के बहुमत से ही हटाई जा सकती है !!!! 
 मेरा निजी दृष्टिकोण यह है कि अपनी संस्कृति व वैज्ञानिक विरासत के प्रति हमारी निष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।संवैधानिक स्तर पर स्वीकृति के साथ कार्यरूप में जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा को भारतवर्ष से, जनमानस में वैज्ञानिक जागृति व अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति जागरूकता द्वारा ही हटाया  जा सकता है  !!!! 
 हम नववर्ष के दिन को उन देशों को शुभकामना संदेश देकर अवश्य मनाऐंगे जो ग्रेगेरियन मान्यता को नववर्ष के रूप में स्वीकारते हैं। जबकि हम वहां के मौसम, पेड़-पौधों और प्राणियों की स्थितियों के भी साक्षी हैं । 

इन ईसाई देशों में से साम्राज्यवादी शक्तियों नें जहां भी अपने उपनिवेश स्थापित किए, उन देशों पर अपना कैलेंडर ज़बरदस्ती लाद दिया !!!!
वैज्ञानिक पद्धति के भारतीय पंचांग को दरकिनार कर,
एक नहीं कई विसंगतियों से भरा ये नववर्ष , भारत में भी कंपकंपाती ठंड से शुरू होता है- - - - ये ग्रैगेरियन कैलेंडर का "न्यू ईयर "!! 
आइए, अब ज़रा सेप्टेंबर से दिसंबर  तक के अंकों की गणना अर्थात गिनती भी कर लें। सितंबर (लैटिन सेप्टम से, "सात") या सितंबर मूल रूप से (प्राचीन "रोमन कैलेंडर" जो दस महीनों का था) में सातवां था। प्राचीन "रोमन कैलेंडर" भी विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की तरह मार्च माह, मार्शियस से शुरू हुआ था (मंगल के महीने) " ऑक्टो, रोमन "आठ" के लिए। "नौवेम, रोमन के लिए "नौ और दिसंबर का नाम डेसेम से आया है। लैटिन "दस" के लिए प्रयुक्त होता है। 
(September (from Latin septem, "seven") or September was originally the seventh of ten months. On the ancient "Roman calendar" that began with March Martius, "Mars' month".
-octo, Latin for “eight. "novem, Latin for “nine. December's name come from decem, Latin for “ten."-) 
इस प्रकार ग्रेगेरियन कैलेंडर के नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें महीने के लिए प्रयुक्त होने वाले नाम, अपने वास्तविक अर्थो में सात, आठ, नौं और दस अंक हैं।  अर्थात बारहवें को दसवां महीना बताकर बने बारह महीनों के कैलेंडर को हमनें अपने ज्योतिष की प्रामाणिक गणनाओं, सूर्य-चंद्र व राशियों पर  आधारित (पंचांग) अर्थात भारतीय कैलेंडर के स्थान पर क्यों अपनाना चाहते  हैं ?
पूर्णतः वैज्ञानिक भारतीय पंचांग (कैलेंडर) में  तो मासों का नामकरण भी प्रकृति के मानक नक्षत्रों पर आधारित है।
चित्रा नक्षत्र वाली पूर्णिमा के मास का नाम चैत्र है। विशाखा का वैखाख है। ज्येष्ठा का ज्येष्ठ है। आषाढ़ की पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढ़ा दो नक्षत्रों में से एक रहता है। श्रवण नक्षत्र का मास श्रावण है।उत्तराभद्रपद का भाद्रपद है। अश्विनी का अश्विन है। कृतिका का कार्तिक है। मृगशिरा का मार्गशीर्ष। पुष्य का पौष। मघा का माघ और  
जब पूर्णिमा को पूर्वाफाल्गुनी या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होता है तो फाल्गुन मास होता है।
इसी तरह भारत में ३५४ दिन के बाद वर्ष और ३६५ दिन ६ घंटे ९ मिनट ११ सैकेंड के अंतर को दूर करने के लिए भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने २ वर्ष ८मास १६ दिन के उपरांत एक अधिक मास या पुरुषोत्तम अथवा मलमास की व्यवस्था करके कालगणना के साथ प्रकृति की शुद्धता और वैज्ञानिकता को संतुलित किया है।
उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में यही उचित होगा कि हम सभी भारतवासी पूर्णतः वैज्ञानिकता और प्रकृति के नियमों पर आधारित अपनी युगों की वैज्ञानिक एवं वैश्विक भारतीय कालगणना का प्रयोग करें। 
- - - -  औपनिवेशिकता के कारण थोपी गई इस अवैज्ञानिक परंपरा का सत्य समझें? 
पर हम सब जानते हैं कि किसी भी सत्य को जानने, तथ्य को मानने और - - - - कार्यरूप में बदलने में 🙄 बहुत बड़ा अंतर होता है। औपनिवेशिक सत्ता द्वारा थोपे गए जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा हमारे स्वाधीन भारतवर्ष के स्वतंत्रता अमृतकाल में जनता के बहुमत से ही हटाई जा सकती है !!!! 
 मेरा निजी दृष्टिकोण यह है कि अपनी संस्कृति व वैज्ञानिक विरासत के प्रति हमारी निष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।संवैधानिक स्तर पर स्वीकृति के साथ कार्यरूप में जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा को भारतवर्ष से, जनमानस में वैज्ञानिक जागृति व अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति जागरूकता द्वारा ही हटाया  जा सकता है  !!!! 
 हम नववर्ष के दिन को उन देशों को शुभकामना संदेश देकर अवश्य मनाऐंगे जो ग्रेगेरियन मान्यता को नववर्ष के रूप में स्वीकारते हैं। 
प्रसन्नताओं के लिए, खुशियों के लिए द्वार बंद करने की परंपरा भारतीय संस्कृति में सिखाई ही नहीं जाती। अतः सबको नववर्ष की आरोग्यता , सुख, समृद्धि , शांति और सकारात्मकता भरी शुभकामनाएँ। 
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

सोमवार, 29 दिसंबर 2025

*अरुणाचलम के प्रसिद्ध योगी:श्री महर्षि रमण *

🇮🇳भारतीय स्वतंत्रता का अमृत काल 🪷
🕉️बीसवीं शताब्दी के महान संत महर्षि रमण के जन्मदिवस पर कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धासुमन 🪷🪷।
इन दिनों 🔥कार्तिगाई दीपम प्रज्ज्वलित करने को लेकर हुए अनर्गल विवाद जिन आस्थाओं के प्रति प्रश्नचिह्न लगा रहे थे। उसी पावन दीपज्योति नें,सहस्राब्दियों के अपने जाज्वल्यमान प्रकाश से, अरुणाचलेश्वर (अनादि भगवान शिव ) के मूर्तिमन्त स्वरूप से उत्प्रेरणा लेकर अनेक आध्यात्मिक गुरुओं नें वर्तमान में मानवता का मार्गदर्शन किया है। 
कार्तिगाई दीपम की परम्परा अति प्राचीन है। पुरातन ग्रंथों में इसके उल्लेख मिलते हैं। तमिल साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ 'अहनानुरु' में इस *प्रकाश पर्व *का उल्लेख मिलता है जो "संगम साहित्य" की महान कृतियों में से एक है और इसमें २ ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से ३०० ईस्वी के मध्य घटित हुई घटनाओं का वर्णन है। संगम युग की प्रसिद्ध प्रसिद्ध कवयित्री और संत अव्वैयार जी ने भी अपनी कविताओं में *कार्तिगाई दीपम * का उल्लेख किया है। पूर्ववर्ती संगम-साहित्य में इस त्यौहार को *पेरुविला* के नाम से भी जाना जाता रहा है । (वर्ष१९९१ में, शुक्र ग्रह पर २०.६ कि.मी चौड़े क्रेटर को अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ द्वारा *अव्वियार क्रेटर* नाम दिया गया था । उनका कथन - "आपने जो सीखा है वह मुट्ठी भर है!आपने जो नहीं सीखा है वह दुनिया के बराबर है!" को 'नासा' के 'कॉस्मिक प्रश्न प्रदर्शनी' में सम्मिलित  किया गया।)- - - - कहने का अर्थ यह है कि यह ऐतिहासिक प्रमाण *कार्तिगाई दीपम* की पुरातन विरासत का उद्घोषक है।  
महर्षि रमण का कार्तिगाई दीपम से गहरा संबंध है ।तिरुवन्नामलाई में अरुणाचल पर्वत पर प्रकाशित होने वाला यह विशाल प्रदीप, महर्षि के लिए आध्यात्मिक रूप से भगवान   शिव का स्वरूप रहा। उनका मानना था कि कार्तिगाई दीपम का वास्तविक अर्थ है - '' मैं शरीर हूँ के विचार से आगे बढ़कर आंतरिक प्रकाश (आत्मा) का अनुभव करना, जो कि हृदय में समाधि के माध्यम से संभव है।" उन्होंने स्वयं कहा कि इस पर्व का महत्व 'मन को भीतर मोड़कर हृदय में विलीन करना'  है।यह महर्षि रमण जी की तपस्या स्थली है। महर्षि रमण स्वयं को और अरुणाचल पर्वत को एक ही वास्तविकता मानते थे, और इस पर्व पर सभी भक्त इस पहाड़ी की ज्योति को देखकर स्वयं के भीतर के शाश्वत, अद्वैत आत्मा के दिव्य प्रकाश से जुड़ जाते हैं।
महर्षि रमण जी का जन्म ३० दिसम्बर १८७९ को तिरुचुली ,तमिलनाडु में, वकील सुंदरम्‌ अय्यर और अलगंमाल के पुत्ररत्न के रूप में हुआ था। उनका नाम वेंकटरामन रखा गया था। वर्तमान समय में,  वैदिक संस्कृति की बीसवीं शताब्दी में पुनः प्राण प्रतिष्ठा करने वाले संत के रूप में महर्षि रमण जी का स्मरण किया जाता है।  उन्होंने अपने कठिन तप से ज्ञान और आत्मा की खोज की और उसे जागृत किया, उनके हृदय में जीव-जंतु और संसार रूपी इस दुनिया में सभी के प्रति दया भाव था। सभी के हित को लेकर चिंतन भी करते थे। 
सम्पूर्ण विश्व में, "अरुणाचल के प्रसिद्ध योगी, श्री महर्षि रमण "के नाम से प्रख्यात संत के अनुसार "कार्तिगाई दीपम "वह दिन है जब भगवान शिव अरुणाचल पहाड़ी पर 'ज्योति पुंज' (अग्नि के स्तंभ) के रूप में प्रकट हुए थे। महर्षि रमण अरुणाचल को अपना गुरु और साक्षात शिव का रूप मानते थे।यही तिरूवन्नामलाई, महर्षि रमण जी का निवास था। इस पवित्र पर्वत की विरूपाक्षी गुफा में उन्होंने वर्षों कठोर तप किया है। मुझे स्मरण आती है उनसे जुड़ी लिखित घटना - - - - पवित्र पर्वत अरूणाचलम् एवं इसकी तलहटी में बने आश्रम परिसर में सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक 'कार्लगुस्ताव जुंग 'नें, 'अन्नामलाई स्वामी' से भेंट कर अपने प्रश्नों के सटीक उत्तर पाए थे।
यह वर्ष १९३८ की बात है -  - सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्लगुस्ताव जुंग नें, भारत एवं भारतीय आध्यात्मिक साहित्य के बारे में काफी कुछ पढ़ा था। आध्यात्मिक जिज्ञासा की प्रबलता के साथ उनमें वैज्ञानिक अभिवृत्ति भी दृढ़ थी। वे आध्यात्मिक सत्यों को वैज्ञानिक रीति- नीति से अनुभव करना चाहते थे। यही जिज्ञासु भाव उन्हें भारत भूमि की ओर आकृष्ट कर खींच रहा था। इसी समय सन् १९३८ के प्रारंभ में उन्हें भारत वर्ष की अंग्रेज सरकार की ओर से भारत आने के लिए आमंत्रण मिला।महर्षि रमण के नाम से प्रभावित जुंग, तिरूवन्नामलाई के लिए चल पड़े। कार्लगुस्ताव जुंग नें शाम को महर्षि से मुलाकात की। महर्षि उस समय शरीर पर केवल कौपीन धारण किए हुए थे। अपनेपन से भरे उनके चेहरे पर बालसुलभ निर्दोष हँसी और आध्यात्मिक प्रकाश था। प्रख्यात् मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग को महर्षि अपने से लगे। हालांकि उनके मन में शंका भी उठी कि ये साधारण दिखने वाले महर्षि क्या उनके वैज्ञानिक मन की जिज्ञासाओं का समाधान कर पाएँगे ? उनके मन में आए इस प्रश्र के उत्तर में महर्षि ने हल्की सी मीठी हंसी के साथ कहा- भारतीय प्राचीन ऋषियों कीआध्यात्म विद्या सम्पूर्णतः वैज्ञानिक है। आधुनिक वैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक चिन्तन-चेतना के लिए इसे वैज्ञानिक अध्यात्म कहना ठीक रहेगा। इसके मूलतत्त्व पांच हैं : - - - - १)जिज्ञासा- इसे तुम्हारी वैज्ञानिक भाषा में शोध समस्या भी कह सकते हैं।
२) प्रकृति एवं स्थिति के अनुरूप सही साधना विधि का चयन। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे अनुसन्धान विधि भी कह सकते हैं। 
३) शरीर मन की विकारविहीन प्रयोगशाला में किए जाने वाले त्रुटिहीन साधना प्रयोग। वैज्ञानिक ढंग से कहें तो नियंत्रित स्थति में की जाने वाली वह क्रिया प्रयोग है, जिसमें सतत् सर्वेक्षण किया जाता है, Experiment is observation of any action under control conditions. उन्होंने मधुर अंग्रेजी भाषा में अपने कथन को दुहराया। 
४) किए जा रहे प्रयोग का निश्चित क्रम से परीक्षण एवं सतत् ऑकलन। 
 ५)एवं अन्तिम इन सबके परिणाम में सम्यक् निष्कर्ष। 
महर्षि ने मृदुल- मधुर सहज स्वर में अपनी बातें पूरी की।  कार्ल जुंग सन्तुष्ट थे । 
महर्षि नें यह भी स्पष्ट किया-- “ मेरे आध्यात्मिक प्रयोग की वैज्ञानिक जिज्ञासा थी- मैं कौन हूँ ? इसके समाधान के लिए मैंने मनन एवं ध्यान की अनुसंधान विधि का चयन किया। इसी अरूणाचलम् पर्वत की विरूपाक्षी गुफ़ा में शरीर व मन की प्रयोगशाला में मेरे प्रयोग चलते हैं। इन प्रयोगों के परिणाम में अपरिष्कृत अचेतन परिष्कृत होता गया। चेतना की नयी- नयी परतें खुलती गयी।इनका मैंने निश्चित कालक्रम में परीक्षण व आकलन किया और अन्त में मैं निष्कर्ष पर पहुँचा, मेरा अहं आत्मा में विलीन हो गया। बाद में आत्मा-परमात्मा से एकाकार हो गयी। अहं के आत्मा में स्थानान्तरण ने मनुष्य को भगवान् में रूपान्तरित कर दिया। 
कार्ल जुंग के चेहरे पर पूर्ण प्रसन्नता और गहरी सन्तुष्टि के भाव थे।वैज्ञानिक अध्यात्म के मूल तत्त्व उन्हें समझ में आ चुके थे। 
महर्षि रमण से इस भेंट के बाद जब भारत से वापस लौटे तब वर्ष १९३८ में उन्होंने येले विश्वविद्यालय में अपना  व्याख्यान दिया “मनोविज्ञान एवं धर्म ”। इसमें उन्होंने अपने नए दृष्टिकोण का परिचय था।बाद में उनकी विचारधारा में जो भी बदलाव आए हों परंतु अपनी पुस्तक  “ श्री रमण एण्ड हिज़ मैसेज टु मॉडर्न मैन ’’ के प्राक्कथन में अपनी ओर से लिखा- “ श्री रमण भारत भूमि के सच्चे पुत्र हैं। वे अध्यात्म की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति के प्रकाशपूर्ण स्तम्भ हैं और साथ में कुछ अद्भुत भी। उनके जीवन एवं शिक्षा में हमें पवित्रतम् भारत के दर्शन होते हैं, जो समूची मानवता को वैज्ञानिक अध्यात्म के मूलमन्त्र का सन्देश दे रहा है।” 
महर्षि रमण जी नें जीवन के हर प्रश्न का उत्तर इतने सरल भाव से दिया है कि हमारी सारी शंकाओं का समाधान सहज ही हो जाता है।
रमण महर्षि जी ने कहा है कि हमारा वास्तविक स्वभाव शांत और आनन्दमय होता है। जैसे एक झील के नीचे का हिस्सा हमेशा शांत रहता है, वैसे ही हमारा सच्चा स्वभाव शांत और प्रसन्न रहने का है। कभी-कभी हमारे विचारों में भले ही हलचल हो। हम शांत रहकर आंतरिक आनन्द शांति को अनुभव कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आनन्द सबसे महत्वपूर्ण भावना है, और प्रसन्न रहने के लिए हमें अपने सच्चे रूप को जानना चाहिए। इसके लिए स्वयं से प्रश्न करने का निरन्तर अभ्यास आवश्यक है।
 महान संत महर्षि  रमण जी के पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन 🙏🪷🪷 स्वर्णअनिल।

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

२८ दिसम्बर

पौष की ठंड से कंपकंपाते दिन  
 नभ से नहीं पर हम सबके जीवन से
 जाने क्यों, उषा का उजाला गया छिन
रौशन यादों की अगरबत्तियाँ,
तब से सुलगती रहती हैं रात-दिन !
उनका धुँआ आँखों को समंदर बना,
धुंधला कर लौट आता है---- तेरे बिन !

सोमवार, 24 नवंबर 2025

!! माज़ी के खुलते दरीचे !!

होती है तारीफ़ अहमियत की,
इंसानियत की मगर कद्र होती है।
तरजीह मत दे इंसानियत पर ओहदे को,
बंदे पर ख़ुदा की नज़र होती है।
                  ******** (धर्मेन्द्र जी।)

  जीवन की भागदौड़ में ,अपना सबकुछ पीछे छूट जाता है। पत्नी-माता-कार्यक्षेत्र के दायित्व निभाने में 'अपनाआप' कहीं किसी बंद अटैची में रखे पुराने चित्रों सा दबा रह जाता है। - - - - 
इंद्रधनुषी समय के वे चलचित्र ,जिन पर हमने सबसे पहला नाम ,बचपन में अनजाने ही "धर्मेंद्र जी" लिख लिया था। कारण था १९६२ का भारतपर थोपा गया चीनी युद्ध।उस युद्ध में सरकारी उदासीनता से उपजी सैनिकों के कष्टों व विभीषिकाओं को हमने हिमाचल प्रदेश के सैनिकों से लगभग ९ वर्ष की आयु में अपने घर आए भाई जी से सुना था और उन स्मृतियों को 
१९६४ में  आई "हकीकत "फिल्म में  जीवन्तता देखा। ---- देश की सीमाओं की सुरक्षा में लद्दाख के असंवेदनशील प्रकृति में देश के लिए प्राण न्यौछावर करते , सौंदर्य और संवेदनशील धर्मेंद्र जी की छवि हमारे बालमन पर गहरी अंकित हो गई। सुरक्षा सेनाओं से जुड़े पिता, चाचा, जीजा, भाई वाले पराजयों के परिवार में वर्दी के लिए आत्मीयता ने इसे और बढ़ाया।  
इसके बाद विद्यालय से (वर्तमान -बुद्ध जयंती पार्क)बुद्धा गार्डन पिकनिक पर गए तो एयरफ़ोर्स की वर्दी में नीला आकाश (१९६५) की शूटिंग करते धर्मेंद्र जी को निकट से देखा-सुना तो - - - - वे हमारे मनपसंद "हीरो" हो गए। उसके बाद किसी भी पत्र-पत्रिका मे छपे धर्मेंद्रजी के चित्र इकट्ठे करना हमारी अभिरुचि बन गया था -- - - हमारी नीचे रंग कीअटैची ,जो हमें विद्यालय की स्क्रैप-फाईलों के लिए फूल- पत्तों व आवश्यक सामग्री रखने के लिए दी गई थी वो केवल 'हमारे हीरो' के चित्रों से भर गई थी। घर-बाहर सब जानते थे। आज भी याद आता है कि 'अनुपमा' के लिए हुए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पिताजी को जाते देख , हमारे भीतर पिए गए मौन आँसुओं को पिताजी नें समझा और हमें भी समारोह में साथ ले गए थे। 
फूल और पत्थर, सत्यकाम, आदमी और इंसान  - - - - आदि परिवार के साथ देखी। लेडी श्रीराम कॉलेज में पड़ते समय घर पर आई एक सहेली नें हंसते हुए माँ से कहा कि " अम्मा इसे गुड्डी ज़रूर दिखाना इस पर ही बनी है। " - - - - सच में उस वक्त बहुत हैरानी हुई थी कि हमारी बातें फ़िल्म वालों को कैसे पता चली !! ढेरों यादें हैं !! 
१ नवंबर २०२५को अस्पताल में भर्ती होने पर लगा कि ८ दिसंबर को अपना जन्मदिन अवश्य मनाऐंगे - - - - १२को लौटे तो आस बंध गई थी- - - - पर - - - - २४ नवंबर को ---- सब समाप्त हो गया।  अपनी कला और व्यक्तित्व के गुणों से जनसाधारण के सर्वप्रिय अभिनेता, लोकसभा सांसद के रूप में राष्ट्र सेवक और फिल्म अभिनेता, निर्देशक, निर्माता के रूप जनमाना में अपनी विशिष्टताओं का लोहा मनाने वाले सुन्दर. सौम्य, संवेदनशील धर्मेंद्रजी को, अशेष श्रद्धांजलि एवं कोटिश नमन....🖊



रविवार, 20 जुलाई 2025

गढ़मुक्तेश्वर : मुक्ति की विरासत सहेजे पावन धाम !!

🔱काशी से लौटते हुए गढ़ गंगा जी के दर्शन हुए तो शिवपुराण में वर्णित, गंगाजी के तट पर बसे विश्वेश्वर के प्रिय धाम गढ़मुक्तेश्वर को, रेलगाड़ी से ही नमन किया। पुराणों में *शिव वल्लभ * नाम से वर्णित इस पावन तीर्थ की महिमा काशी से भी अधिक मानी गई है - - - -  
"काश्यां मरणात्मुक्ति: मुक्ति: मुक्तीश्वर दर्शनात्।।" 
भागवत पुराण और महाभारत के अनुसार यह क्षेत्र कुरु की राजधानी का भाग था।
शिवपुराण के अनुसार - " गणानां मुक्तिदानेन गणमुक्तिश्वरः स्मृतः" इससे जुड़ी कथा के अनुसार - - - - एक बार मंदराचल पर्वत की गुफा में ब्रह्मर्षि दुर्वासा तपस्या में निमग्न थे। भगवान शंकर के गण  घूमते हुए वहां पहुंचे। गणों नें तपस्यारत ब्रह्मर्षि का उपहास किया। ऋषि से पिशाच होने का श्राप मिला तो शिवगण चरणों में गिर पड़े। उनका अपराध क्षमा कर दुर्वासा ऋषि नें हस्तिनापुर के समीप खांडव वन में स्थित शिववल्लभ क्षेत्र में तपस्या कर भगवान आशुतोष की कृपा प्राप्त कर पिशाच योनि से मुक्ति का उपाय बताया।  पिशाच बने शिवगणों ने शिववल्लभ क्षेत्र में आकर कार्तिक पूर्णिमा तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन उन्हें दर्शन दिएऔर पिशाच योनि से मुक्त कर दिया। तब से शिववल्लभ क्षेत्र का नाम 'गणमुक्तिश्वर' पड़ गया। बाद में 'गणमुक्तिश्वर' का अपभ्रंश 'गढ़मुक्तेश्वर' हो गया। गणमुक्तिश्वर का प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर आज भी इस कथा का साक्षी है। 
मान्यता है कि 'मुक्तिश्वर महादेव' के सामने पितरों को पिंडदान और तर्पण करने से गया श्राद्ध करने कीआवश्यकता नहीं रहती। पांडवों ने महाभारत के युद्ध में मारे गये असंख्य वीरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान यहीं मुक्तिश्वरनाथ के मंदिर के परिसर में किया था। यहां कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को पितरों की शांति के लिए दीपदान करने की परम्परा भी रही है। पांडवों ने भी अपने पितरों की शांति के लिए मंदिर के समीप गंगा में दीपदान किया था तथा कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक यज्ञ किया था। तभी से यहां कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगना प्रारंभ हुआ। कार्तिक पूर्णिमा को भारत के अनेक नगरों में मेलों का आयोजन होता है किन्तु गढ़मुक्तेश्वर का मेला उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।
जिसके दर्शन मात्र से मुक्ति प्राप्त होती है उस स्थान की ऊर्जा सर्वत्र सकारात्मक्ता लाए और शिव का प्रिय श्रावण मंगलमय हो।।🙏🌷🌷🌷🌷स्वर्ण अनिल ।