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बुधवार, 31 दिसंबर 2025

भारतीय संस्कृति के उन्नायक : कन्हैयालाल मणिकलाल मुंशी जी।

🇮🇳 भारतीय स्वतंत्रता का अमृत काल 🪷🪷
🇮🇳 भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता के उन्नायक"श्री कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी" को श्रद्धाँजलि 🪷🪷
स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, कानून विशेषज्ञ, साहित्यकार तथा शिक्षाविद मुंशी जी (२९ दिसंबर,१८८७ - ८फरवरी, १९७३) महर्षि श्री अरविन्द जी के प्रभाव से,परतन्त्र भारत की स्वतंत्रता हेतु क्रांतिकारी आन्दोलन की ओर झुके। मुंबई में बसने के बाद, वे 'भारतीय होमरूल आंदोलन' में शामिल हो गए और १९१५ में इसके सचिव बने। १९२७ में, वे बॉम्बे विधान सभा के लिए चुने गए, लेकिन 'बारदोली सत्याग्रह' के बाद उन्होंने इससे त्याग पत्र दे दिया था। स्वाधीनता संग्राम में अपने योगदान के लिए उन्होंने दो वर्ष जेल में बिताए। मुंशी जी वर्ष १९३७ के बॉम्बे प्रेसीडेंसी चुनाव में चयनित होकर वहां के गृह मंत्री बने। गृहमंत्री के रूप में उन्होंने बॉम्बे में सांप्रदायिक दंगों को दबाया। वर्ष १९४० में 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' में भाग लेने के बाद मुंशी को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। 
मुंशी जी अगस्त १९४७ में भारत के राष्ट्रध्वज का चयन करने वाली तदर्थ ध्वज समिति में थे और डॉ अंबेडकर जी की अध्यक्षता में भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के सदस्य भी थे।राजनीतिज्ञ और शिक्षक होने के अलावा मुंशी एक पर्यावरणविद् भी थे राष्ट्रीय शिक्षा के समर्थक थे। वे पश्चिमी शिक्षा के अंधानुकरण का विरोध करते थे। मंत्री के रूप में   वन महोत्सव का शुभारंभ उन्होंने आरंभ किया था।   वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल भी रहे थे। भारत सरकार के खाद्य मंत्री पद पर रहे। स्वाधीनता से लगभग दस वर्ष पूर्व उन्होंने मुंबई में, नवम्बर, १९३८ में उन्होंने 'भारतीय विद्या भवन' की स्थापना की ताकि भारत के वर्तमान तथा भविष्य को भारत के सांस्कृतिक एवं वैचारिक पुनर्जागरण से संजोया जा सके। भारतीय विद्या भवन के आज सारे विश्व में लगभग १२० केंद्र और इनसे जुड़े हुए ३५० से अधिक शैक्षणिक संस्थान हैं।
"कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जी का स्पष्ट कथन है कि " मेरे लिए भारतीय संविधान के पहली पंक्ति 'इण्डिया दैट इज़ भारत' वाक्यांश का अर्थ केवल एक भूभाग नहीं बल्कि एक अंतहीन सभ्यता है, ऐसी सभ्यता जो अपने आत्म-नवीनीकरण के ज़रिये सदैव जीवित रहती है।--भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान में कार्य करने की शक्ति मुझे अतीत के प्रति अपने विश्वास से ही मिली है। भारत की स्वतंत्रता अगर हमें 'भगवद्गीता से दूर करती है या हमारे करोड़ों लोगों के इस विश्वास या श्रध्दा को तोड़ती है, जो हमारे मंदिरों के प्रति उनके मन में है और हमारे समाज के ताने-बाने को तोड़ती है तो ऐसी स्वतंत्रता का मेरे लिए कोई मूल्य नहीं है। सोमनाथ मंदिर के पुनरुध्दार का जो सपना मैं हर रोज देखता आया हूं, उसे पूरा करने का मुझे गौरव प्राप्त हुआ है। इससे मेरे मन में यह एहसास और विश्वास उत्पन्न होता है कि इस पवित्र स्थल के पुनरुद्धार से हमारे देशवासियों की धार्मिक अवधारणा अपेक्षाकृत और शुध्द होगी तथा इससे अपनी शक्ति के प्रति उनकी सजगता और भी बढ़ेगी।"
स्वतंत्र भारत में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण भी मुंशी जी  की प्रमुख कार्यसूची में था। उनकी इस सक्रियता के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने एक कैबिनेट बैठक के बाद कन्हैयालाल मुंशी से कहा था, "आप सोमनाथ मंदिर की पुनःस्थापना के लिए जो प्रयास कर रहे हैं, वे मुझे पसंद नहीं हैं।" 
१९५२ से १९५७ तक  उत्तर प्रदेश राज्य के राज्यपाल रहे  कन्हैयालाल मुंशी जी नें १९५९ में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता से त्यागपत्र देकर चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी को अपनाया ।  कुछ समय बाद उन्होंने भारतीय जनसंघ की सदस्यता ग्रहण कर ली।
प्रख्यात साहित्यकार के रूप में उन्होंने गुजराती, हिंदी व अंग्रेज़ी में सौ से ज्यादा उत्कृष्ट ग्रंथों की रचना की थी। इन्होंने मुंशी प्रेमचंद के साथ 'हंस' पत्रिका का संपादन भी संभाला था। ‘यंग इंडिया’ के संयुक्त सम्पादक और 'भवन्स जर्नल’ के सम्पादक रहे। सन् १९३८ से भारतीय विद्या भवन के आजीवन अध्यक्ष और ‘ सन् १९३७-५७ के मध्य, दस वर्षों तक गुजराती साहित्य परिषद के अध्यक्ष, सन् १९४४ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष। सन् १९५१ से मृत्युपर्यन्त संस्कृत विश्व परिषद के भी अध्यक्ष रहे। 
हिन्दी में उनकी प्रमुख प्रकाशित कृतियाँ हैं :---- ‘लोमहर्षिणी’, ‘लोपामुद्रा’, ‘भगवान परशुराम’, ‘तपस्विनी’, ‘पृथ्वीवल्लभ’, ‘भग्नपादुका’, ‘पाटण का प्रभुत्व’, कृष्णावतार के सात खंड—‘बंसी की धुन’, ‘रुक्मिणीहरण’, ‘पाँच पांडव’, ‘महाबली भीम’, ‘सत्यभामा’, ‘महामुनि व्यास’, ‘युधिष्ठिर’ (उपन्यास); ‘वाह रे मैं वाह’ (नाटक); ‘आधे रास्ते’, ‘सीधी चढ़ान’, ‘स्वप्नसिद्धि की खोज में’ (आत्मकथा के तीन खंड)।
आदरणीय मुंशी जी सांस्कृतिक एकीकरण के बिना किसी भी सामाजिक -राजनीतिक कार्यक्रम का कोई महत्व नहीं मानते थे।भारतीय संस्कृति के पुरोधा कन्हैयालाल माणिकलाल मुशी जी के जन्मदिवस पर कोटि-कोटि नमन व श्रद्धासुमन - - 🪷🪷🪷🪷🪷 स्वर्णअनिल।

नववर्ष की शुभकामनाएँ !!!!

नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!! नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!! नववर्ष ****!! नववर्ष **** !!!! 
हर बार की तरह फिर वही यक्षप्रश्न - - - - क्या आप अंग्रेजी नववर्ष पर शुभकामनाएँ देंगी?
आप तो भारत पर हुए औपनिवेशिक "सांस्कृतिक आक्रमण" को राजनैतिक आक्रमण से बड़ा मानती हैं फिर न्यू ईयर - - - -?
आप तो भारतीय नव वर्ष को मानती और मनाती हैं!" 
प्रकृति के नव-सृजन को, सृष्टि के नव- निर्माण को.... नव-पल्लवों की कोमल हथेलियों पर रचकर, अमराईयों में कूकती कोयल की तान में बसकर.... नव-उल्लास, नव-आशा, नव-जागरण की पावन ज्योति जगत के कण-कण में जगाने वाले भारतीय - नववर्ष में हमारे उत्सवधर्मी संस्कृति जीवंत हो उठती है। एक सत्य और है - - - -हम भोर के उजालों भरी पावन वेला में भारतीय नववर्ष मनाते हैं अर्द्धरात्रि में नहीं! 
सच बात यह है कि मैं हिमाचल प्रदेश की बेटी हूं इसलिए बचपन से ही "विषु-साज्जे" , अर्थात बैसाखी को नववर्ष मनाती आई हूं।बंगाल में इस दिन को ‘नाबा वैशाख’ या ‘पौला बौशाख’,  केरल में ‘विशु’, असम में ‘‘बोहाग बिहू’, पंजाब में ‘बैसाखी ’, उड़ीसा में ‘पाना संक्रांति’, तमिलनाडु में ‘पुथांडु ’, बिहार में ‘सतुआनि’ और ‘जुड़ी शीतल’ के नाम से मनाया जाता है।
विक्रमी संवत का चैत्र का महीना है जो समस्त भारतीय जनमानस के लिए शुभता का प्रतीक है, हमारे **** भारतीय सौर पंचांग, विक्रम संवत् का पहला महीना है जिसे न केवल देश भर में, बल्कि इस उपमहाद्वीप के बाहर बाली, थाईलैंड आदि देशों में भी नववर्ष के रूप में मनाया जाता है। राशि चक्र की पहली राशि मेष में सूर्य के प्रवेश के साथ आरंभ चैत्र में एक नई ऋतु का आगमन होता है।मेरा मानना है कि यह मास हमारी कृषि प्रधान परंपरा का ऊर्जस्वी प्रतीक भी है इसीलिए इस मास में शक्ति की पूजा होती है जो मनुष्य की अंतर्निहित चेतना को जाग्रत और अभिव्यक्त करने वाली पराशक्ति भगवती दुर्गा का नमन करने की हमारी चिरंतन संस्कृति का परिचायक है। हमारा भारतीय नववर्ष, धरती के प्रकृति द्वारा किए गए श्रृंगार से सजे इसी महीने से प्रारंभ होता है।
इसके विपरीत अंग्रेज़ी महीने, काल गणना पर कम और व्यक्तिगत अहंकार की तुष्टि से अधिक जुड़े हैं! 
आप सभी परिचित होंगे किस तरह ३१दिन वाले जूलियस सीज़र के नाम के महीने के एकदम बाद आगस्टस नें, अपने नाम वाले महीने में भी ३० की जगह ३१ दिन कर दिए। पोप ग्रेगेरियन (रोम के १३वें पोप) नें तो तब प्रचलित जूलियन कैलेंडर के ईसवी सन् १५८२ में नेपुलस् के ज्योतिषी एलाय सियस लिलियस (Aloysitus lilius) के परामर्श से १५८२ ईस्वी में ५ अक्टूबर को (१० दिन जोड़कर), अक्टूबर की १५ वीं तिथि घोषित कर, निश्चित किया। इस तरह कैलेंडर में १० दिन जोड़ कर - - - - वर्तमान वाला कैलेंडर चलाया गया ?
 इस नवीन पद्धति (नये कैलेंडर) को ईसाई धर्मावलंबी राष्ट्रों नें अलग - अलग वर्षों में अपनाया----
 १५८२ ई. में इटली, फ्रांस, स्पेन और पुर्तगाल नें ! प्रशिया, जर्मनी के रोमन कैथोलिक प्रदेश स्विट्जरलैंड, हॉलैंड और फ़्लैंडर्स ने १५८४ ई॰ में!
पोलैंड ने १५८६ ई॰ में!
हंगरी ने १५८७ ई॰ में!
जर्मनी और नीदरलैंड के प्रोटेस्टेंट प्रदेश तथा डेनमार्क ने १७०० ई॰ में !
ब्रिटिश साम्राज्य ने १७५२ ई॰ में,
जापान ने १९७२ ई॰ में !
चीन ने १९१२ ई॰ में! बुल्गारिया ने १९१५ ई॰ में! तुर्की और सोवियत रूस ने १९१७ ई॰ में !
 युगोस्लाविया और रोमानिया ने १९१९ ई॰ में अपनाया।
साम्राज्यवादी ईसाई देशों  शक्तियों नें जहां भी अपने उपनिवेश स्थापित किए, उन देशों पर अपना कैलेंडर ज़बरदस्ती लाद दिया !!!!
यह उनके अहंकार की तुष्टि थी परंतु स्वतन्त्र भारत की राजनैतिक सत्ता नें विशुद्ध वैज्ञानिक पद्धति के भारतीय पंचांग को दरकिनार कर, एक नहीं कई विसंगतियों से भरे पाश्चात्य नववर्ष को क्यों स्वीकारा ?----हम नहीं जानते।। 
भारत में  कंपकंपाती ठंड से शुरू होता है- - - - ये ग्रैगेरियन कैलेंडर का "न्यू ईयर "!! 
आइए, अब ज़रा सेप्टेंबर से दिसंबर  तक के अंकों की गणना अर्थात गिनती भी कर लें। सितंबर (लैटिन सेप्टम से, "सात") या सितंबर मूल रूप से (प्राचीन "रोमन कैलेंडर" जो दस महीनों का था) में सातवां था। प्राचीन "रोमन कैलेंडर" भी विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की तरह मार्च माह, मार्शियस से शुरू हुआ था (मंगल के महीने) " ऑक्टो, रोमन "आठ" के लिए। "नौवेम, रोमन के लिए "नौ और दिसंबर का नाम डेसेम से आया है। लैटिन "दस" के लिए प्रयुक्त होता है। 
(September (from Latin septem, "seven") or September was originally the seventh of ten months. On the ancient "Roman calendar" that began with March Martius, "Mars' month".
-octo, Latin for “eight. "novem, Latin for “nine. December's name come from decem, Latin for “ten."-) 
इस प्रकार ग्रेगेरियन कैलेंडर के नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें महीने के लिए प्रयुक्त होने वाले नाम, अपने वास्तविक अर्थो में सात, आठ, नौं और दस अंक हैं।  अर्थात बारहवें को दसवां महीना बताकर बने बारह महीनों के कैलेंडर को हमनें अपने ज्योतिष की प्रामाणिक गणनाओं, सूर्य-चंद्र व राशियों पर  आधारित (पंचांग) अर्थात भारतीय कैलेंडर के स्थान पर क्यों अपनाना चाहते  हैं ?
पूर्णतः वैज्ञानिक भारतीय पंचांग (कैलेंडर) में  तो मासों का नामकरण भी प्रकृति के मानक नक्षत्रों पर आधारित है।
चित्रा नक्षत्र वाली पूर्णिमा के मास का नाम चैत्र है। विशाखा का वैखाख है। ज्येष्ठा का ज्येष्ठ है। आषाढ़ की पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढ़ा दो नक्षत्रों में से एक रहता है। श्रवण नक्षत्र का मास श्रावण है।उत्तराभद्रपद का भाद्रपद है। अश्विनी का अश्विन है। कृतिका का कार्तिक है। मृगशिरा का मार्गशीर्ष। पुष्य का पौष। मघा का माघ और जब पूर्णिमा को पूर्वाफाल्गुनी या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होता है तो फाल्गुन मास होता है।
इसी तरह भारत में ३५४ दिन के बाद वर्ष और ३६५ दिन ६ घंटे ९ मिनट ११ सैकेंड के अंतर को दूर करने के लिए भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने २ वर्ष ८ मास १६ दिन के उपरांत एक अधिक मास (पुरुषोत्तम/मलमास) की व्यवस्था करके कालगणना के साथ प्रकृति की शुद्धता व वैज्ञानिकता को संतुलित किया है।
उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में यही उचित होगा कि हम सभी भारतवासी पूर्णतः वैज्ञानिकता और प्रकृति के नियमों पर आधारित अपनी युगों की वैज्ञानिक भारतीय कालगणना का प्रयोग करें। 
- - - -  औपनिवेशिकता के कारण थोपी गई इस अवैज्ञानिक परंपरा का सत्य हमें समझना होगा! 
पर हम सब जानते हैं कि किसी भी सत्य को जानने, तथ्य को मानने और - - - - कार्यरूप में बदलने में 🙄 बहुत बड़ा अंतर होता है !! औपनिवेशिक सत्ता द्वारा थोपे गए जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा हमारे स्वाधीन भारतवर्ष के स्वतंत्रता अमृतकाल में जनता के बहुमत से ही हटाई जा सकती है !!!! 
 मेरा निजी दृष्टिकोण यह है कि अपनी संस्कृति व वैज्ञानिक विरासत के प्रति हमारी निष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।संवैधानिक स्तर पर स्वीकृति के साथ कार्यरूप में जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा को भारतवर्ष से, जनमानस में वैज्ञानिक जागृति व अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति जागरूकता द्वारा ही हटाया  जा सकता है  !!!! 
 हम नववर्ष के दिन को उन देशों को शुभकामना संदेश देकर अवश्य मनाऐंगे जो ग्रेगेरियन मान्यता को नववर्ष के रूप में स्वीकारते हैं। जबकि हम वहां के मौसम, पेड़-पौधों और प्राणियों की स्थितियों के भी साक्षी हैं । 

इन ईसाई देशों में से साम्राज्यवादी शक्तियों नें जहां भी अपने उपनिवेश स्थापित किए, उन देशों पर अपना कैलेंडर ज़बरदस्ती लाद दिया !!!!
वैज्ञानिक पद्धति के भारतीय पंचांग को दरकिनार कर,
एक नहीं कई विसंगतियों से भरा ये नववर्ष , भारत में भी कंपकंपाती ठंड से शुरू होता है- - - - ये ग्रैगेरियन कैलेंडर का "न्यू ईयर "!! 
आइए, अब ज़रा सेप्टेंबर से दिसंबर  तक के अंकों की गणना अर्थात गिनती भी कर लें। सितंबर (लैटिन सेप्टम से, "सात") या सितंबर मूल रूप से (प्राचीन "रोमन कैलेंडर" जो दस महीनों का था) में सातवां था। प्राचीन "रोमन कैलेंडर" भी विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों की तरह मार्च माह, मार्शियस से शुरू हुआ था (मंगल के महीने) " ऑक्टो, रोमन "आठ" के लिए। "नौवेम, रोमन के लिए "नौ और दिसंबर का नाम डेसेम से आया है। लैटिन "दस" के लिए प्रयुक्त होता है। 
(September (from Latin septem, "seven") or September was originally the seventh of ten months. On the ancient "Roman calendar" that began with March Martius, "Mars' month".
-octo, Latin for “eight. "novem, Latin for “nine. December's name come from decem, Latin for “ten."-) 
इस प्रकार ग्रेगेरियन कैलेंडर के नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें महीने के लिए प्रयुक्त होने वाले नाम, अपने वास्तविक अर्थो में सात, आठ, नौं और दस अंक हैं।  अर्थात बारहवें को दसवां महीना बताकर बने बारह महीनों के कैलेंडर को हमनें अपने ज्योतिष की प्रामाणिक गणनाओं, सूर्य-चंद्र व राशियों पर  आधारित (पंचांग) अर्थात भारतीय कैलेंडर के स्थान पर क्यों अपनाना चाहते  हैं ?
पूर्णतः वैज्ञानिक भारतीय पंचांग (कैलेंडर) में  तो मासों का नामकरण भी प्रकृति के मानक नक्षत्रों पर आधारित है।
चित्रा नक्षत्र वाली पूर्णिमा के मास का नाम चैत्र है। विशाखा का वैखाख है। ज्येष्ठा का ज्येष्ठ है। आषाढ़ की पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढ़ा दो नक्षत्रों में से एक रहता है। श्रवण नक्षत्र का मास श्रावण है।उत्तराभद्रपद का भाद्रपद है। अश्विनी का अश्विन है। कृतिका का कार्तिक है। मृगशिरा का मार्गशीर्ष। पुष्य का पौष। मघा का माघ और  
जब पूर्णिमा को पूर्वाफाल्गुनी या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र होता है तो फाल्गुन मास होता है।
इसी तरह भारत में ३५४ दिन के बाद वर्ष और ३६५ दिन ६ घंटे ९ मिनट ११ सैकेंड के अंतर को दूर करने के लिए भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने २ वर्ष ८मास १६ दिन के उपरांत एक अधिक मास या पुरुषोत्तम अथवा मलमास की व्यवस्था करके कालगणना के साथ प्रकृति की शुद्धता और वैज्ञानिकता को संतुलित किया है।
उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में यही उचित होगा कि हम सभी भारतवासी पूर्णतः वैज्ञानिकता और प्रकृति के नियमों पर आधारित अपनी युगों की वैज्ञानिक एवं वैश्विक भारतीय कालगणना का प्रयोग करें। 
- - - -  औपनिवेशिकता के कारण थोपी गई इस अवैज्ञानिक परंपरा का सत्य समझें? 
पर हम सब जानते हैं कि किसी भी सत्य को जानने, तथ्य को मानने और - - - - कार्यरूप में बदलने में 🙄 बहुत बड़ा अंतर होता है। औपनिवेशिक सत्ता द्वारा थोपे गए जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा हमारे स्वाधीन भारतवर्ष के स्वतंत्रता अमृतकाल में जनता के बहुमत से ही हटाई जा सकती है !!!! 
 मेरा निजी दृष्टिकोण यह है कि अपनी संस्कृति व वैज्ञानिक विरासत के प्रति हमारी निष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए।संवैधानिक स्तर पर स्वीकृति के साथ कार्यरूप में जनवरी में कैलेंडर बदलने की परंपरा को भारतवर्ष से, जनमानस में वैज्ञानिक जागृति व अपनी सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति जागरूकता द्वारा ही हटाया  जा सकता है  !!!! 
 हम नववर्ष के दिन को उन देशों को शुभकामना संदेश देकर अवश्य मनाऐंगे जो ग्रेगेरियन मान्यता को नववर्ष के रूप में स्वीकारते हैं। 
प्रसन्नताओं के लिए, खुशियों के लिए द्वार बंद करने की परंपरा भारतीय संस्कृति में सिखाई ही नहीं जाती। अतः सबको नववर्ष की आरोग्यता , सुख, समृद्धि , शांति और सकारात्मकता भरी शुभकामनाएँ। 
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सोमवार, 29 दिसंबर 2025

*अरुणाचलम के प्रसिद्ध योगी:श्री महर्षि रमण *

🇮🇳भारतीय स्वतंत्रता का अमृत काल 🪷
🕉️बीसवीं शताब्दी के महान संत महर्षि रमण के जन्मदिवस पर कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धासुमन 🪷🪷।
इन दिनों 🔥कार्तिगाई दीपम प्रज्ज्वलित करने को लेकर हुए अनर्गल विवाद जिन आस्थाओं के प्रति प्रश्नचिह्न लगा रहे थे। उसी पावन दीपज्योति नें,सहस्राब्दियों के अपने जाज्वल्यमान प्रकाश से, अरुणाचलेश्वर (अनादि भगवान शिव ) के मूर्तिमन्त स्वरूप से उत्प्रेरणा लेकर अनेक आध्यात्मिक गुरुओं नें वर्तमान में मानवता का मार्गदर्शन किया है। 
कार्तिगाई दीपम की परम्परा अति प्राचीन है। पुरातन ग्रंथों में इसके उल्लेख मिलते हैं। तमिल साहित्य के प्राचीनतम ग्रंथ 'अहनानुरु' में इस *प्रकाश पर्व *का उल्लेख मिलता है जो "संगम साहित्य" की महान कृतियों में से एक है और इसमें २ ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से ३०० ईस्वी के मध्य घटित हुई घटनाओं का वर्णन है। संगम युग की प्रसिद्ध प्रसिद्ध कवयित्री और संत अव्वैयार जी ने भी अपनी कविताओं में *कार्तिगाई दीपम * का उल्लेख किया है। पूर्ववर्ती संगम-साहित्य में इस त्यौहार को *पेरुविला* के नाम से भी जाना जाता रहा है । (वर्ष१९९१ में, शुक्र ग्रह पर २०.६ कि.मी चौड़े क्रेटर को अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ द्वारा *अव्वियार क्रेटर* नाम दिया गया था । उनका कथन - "आपने जो सीखा है वह मुट्ठी भर है!आपने जो नहीं सीखा है वह दुनिया के बराबर है!" को 'नासा' के 'कॉस्मिक प्रश्न प्रदर्शनी' में सम्मिलित  किया गया।)- - - - कहने का अर्थ यह है कि यह ऐतिहासिक प्रमाण *कार्तिगाई दीपम* की पुरातन विरासत का उद्घोषक है।  
महर्षि रमण का कार्तिगाई दीपम से गहरा संबंध है ।तिरुवन्नामलाई में अरुणाचल पर्वत पर प्रकाशित होने वाला यह विशाल प्रदीप, महर्षि के लिए आध्यात्मिक रूप से भगवान   शिव का स्वरूप रहा। उनका मानना था कि कार्तिगाई दीपम का वास्तविक अर्थ है - '' मैं शरीर हूँ के विचार से आगे बढ़कर आंतरिक प्रकाश (आत्मा) का अनुभव करना, जो कि हृदय में समाधि के माध्यम से संभव है।" उन्होंने स्वयं कहा कि इस पर्व का महत्व 'मन को भीतर मोड़कर हृदय में विलीन करना'  है।यह महर्षि रमण जी की तपस्या स्थली है। महर्षि रमण स्वयं को और अरुणाचल पर्वत को एक ही वास्तविकता मानते थे, और इस पर्व पर सभी भक्त इस पहाड़ी की ज्योति को देखकर स्वयं के भीतर के शाश्वत, अद्वैत आत्मा के दिव्य प्रकाश से जुड़ जाते हैं।
महर्षि रमण जी का जन्म ३० दिसम्बर १८७९ को तिरुचुली ,तमिलनाडु में, वकील सुंदरम्‌ अय्यर और अलगंमाल के पुत्ररत्न के रूप में हुआ था। उनका नाम वेंकटरामन रखा गया था। वर्तमान समय में,  वैदिक संस्कृति की बीसवीं शताब्दी में पुनः प्राण प्रतिष्ठा करने वाले संत के रूप में महर्षि रमण जी का स्मरण किया जाता है।  उन्होंने अपने कठिन तप से ज्ञान और आत्मा की खोज की और उसे जागृत किया, उनके हृदय में जीव-जंतु और संसार रूपी इस दुनिया में सभी के प्रति दया भाव था। सभी के हित को लेकर चिंतन भी करते थे। 
सम्पूर्ण विश्व में, "अरुणाचल के प्रसिद्ध योगी, श्री महर्षि रमण "के नाम से प्रख्यात संत के अनुसार "कार्तिगाई दीपम "वह दिन है जब भगवान शिव अरुणाचल पहाड़ी पर 'ज्योति पुंज' (अग्नि के स्तंभ) के रूप में प्रकट हुए थे। महर्षि रमण अरुणाचल को अपना गुरु और साक्षात शिव का रूप मानते थे।यही तिरूवन्नामलाई, महर्षि रमण जी का निवास था। इस पवित्र पर्वत की विरूपाक्षी गुफा में उन्होंने वर्षों कठोर तप किया है। मुझे स्मरण आती है उनसे जुड़ी लिखित घटना - - - - पवित्र पर्वत अरूणाचलम् एवं इसकी तलहटी में बने आश्रम परिसर में सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक 'कार्लगुस्ताव जुंग 'नें, 'अन्नामलाई स्वामी' से भेंट कर अपने प्रश्नों के सटीक उत्तर पाए थे।
यह वर्ष १९३८ की बात है -  - सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कार्लगुस्ताव जुंग नें, भारत एवं भारतीय आध्यात्मिक साहित्य के बारे में काफी कुछ पढ़ा था। आध्यात्मिक जिज्ञासा की प्रबलता के साथ उनमें वैज्ञानिक अभिवृत्ति भी दृढ़ थी। वे आध्यात्मिक सत्यों को वैज्ञानिक रीति- नीति से अनुभव करना चाहते थे। यही जिज्ञासु भाव उन्हें भारत भूमि की ओर आकृष्ट कर खींच रहा था। इसी समय सन् १९३८ के प्रारंभ में उन्हें भारत वर्ष की अंग्रेज सरकार की ओर से भारत आने के लिए आमंत्रण मिला।महर्षि रमण के नाम से प्रभावित जुंग, तिरूवन्नामलाई के लिए चल पड़े। कार्लगुस्ताव जुंग नें शाम को महर्षि से मुलाकात की। महर्षि उस समय शरीर पर केवल कौपीन धारण किए हुए थे। अपनेपन से भरे उनके चेहरे पर बालसुलभ निर्दोष हँसी और आध्यात्मिक प्रकाश था। प्रख्यात् मनोवैज्ञानिक कार्ल जुंग को महर्षि अपने से लगे। हालांकि उनके मन में शंका भी उठी कि ये साधारण दिखने वाले महर्षि क्या उनके वैज्ञानिक मन की जिज्ञासाओं का समाधान कर पाएँगे ? उनके मन में आए इस प्रश्र के उत्तर में महर्षि ने हल्की सी मीठी हंसी के साथ कहा- भारतीय प्राचीन ऋषियों कीआध्यात्म विद्या सम्पूर्णतः वैज्ञानिक है। आधुनिक वैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक चिन्तन-चेतना के लिए इसे वैज्ञानिक अध्यात्म कहना ठीक रहेगा। इसके मूलतत्त्व पांच हैं : - - - - १)जिज्ञासा- इसे तुम्हारी वैज्ञानिक भाषा में शोध समस्या भी कह सकते हैं।
२) प्रकृति एवं स्थिति के अनुरूप सही साधना विधि का चयन। वैज्ञानिक शब्दावली में इसे अनुसन्धान विधि भी कह सकते हैं। 
३) शरीर मन की विकारविहीन प्रयोगशाला में किए जाने वाले त्रुटिहीन साधना प्रयोग। वैज्ञानिक ढंग से कहें तो नियंत्रित स्थति में की जाने वाली वह क्रिया प्रयोग है, जिसमें सतत् सर्वेक्षण किया जाता है, Experiment is observation of any action under control conditions. उन्होंने मधुर अंग्रेजी भाषा में अपने कथन को दुहराया। 
४) किए जा रहे प्रयोग का निश्चित क्रम से परीक्षण एवं सतत् ऑकलन। 
 ५)एवं अन्तिम इन सबके परिणाम में सम्यक् निष्कर्ष। 
महर्षि ने मृदुल- मधुर सहज स्वर में अपनी बातें पूरी की।  कार्ल जुंग सन्तुष्ट थे । 
महर्षि नें यह भी स्पष्ट किया-- “ मेरे आध्यात्मिक प्रयोग की वैज्ञानिक जिज्ञासा थी- मैं कौन हूँ ? इसके समाधान के लिए मैंने मनन एवं ध्यान की अनुसंधान विधि का चयन किया। इसी अरूणाचलम् पर्वत की विरूपाक्षी गुफ़ा में शरीर व मन की प्रयोगशाला में मेरे प्रयोग चलते हैं। इन प्रयोगों के परिणाम में अपरिष्कृत अचेतन परिष्कृत होता गया। चेतना की नयी- नयी परतें खुलती गयी।इनका मैंने निश्चित कालक्रम में परीक्षण व आकलन किया और अन्त में मैं निष्कर्ष पर पहुँचा, मेरा अहं आत्मा में विलीन हो गया। बाद में आत्मा-परमात्मा से एकाकार हो गयी। अहं के आत्मा में स्थानान्तरण ने मनुष्य को भगवान् में रूपान्तरित कर दिया। 
कार्ल जुंग के चेहरे पर पूर्ण प्रसन्नता और गहरी सन्तुष्टि के भाव थे।वैज्ञानिक अध्यात्म के मूल तत्त्व उन्हें समझ में आ चुके थे। 
महर्षि रमण से इस भेंट के बाद जब भारत से वापस लौटे तब वर्ष १९३८ में उन्होंने येले विश्वविद्यालय में अपना  व्याख्यान दिया “मनोविज्ञान एवं धर्म ”। इसमें उन्होंने अपने नए दृष्टिकोण का परिचय था।बाद में उनकी विचारधारा में जो भी बदलाव आए हों परंतु अपनी पुस्तक  “ श्री रमण एण्ड हिज़ मैसेज टु मॉडर्न मैन ’’ के प्राक्कथन में अपनी ओर से लिखा- “ श्री रमण भारत भूमि के सच्चे पुत्र हैं। वे अध्यात्म की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति के प्रकाशपूर्ण स्तम्भ हैं और साथ में कुछ अद्भुत भी। उनके जीवन एवं शिक्षा में हमें पवित्रतम् भारत के दर्शन होते हैं, जो समूची मानवता को वैज्ञानिक अध्यात्म के मूलमन्त्र का सन्देश दे रहा है।” 
महर्षि रमण जी नें जीवन के हर प्रश्न का उत्तर इतने सरल भाव से दिया है कि हमारी सारी शंकाओं का समाधान सहज ही हो जाता है।
रमण महर्षि जी ने कहा है कि हमारा वास्तविक स्वभाव शांत और आनन्दमय होता है। जैसे एक झील के नीचे का हिस्सा हमेशा शांत रहता है, वैसे ही हमारा सच्चा स्वभाव शांत और प्रसन्न रहने का है। कभी-कभी हमारे विचारों में भले ही हलचल हो। हम शांत रहकर आंतरिक आनन्द शांति को अनुभव कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आनन्द सबसे महत्वपूर्ण भावना है, और प्रसन्न रहने के लिए हमें अपने सच्चे रूप को जानना चाहिए। इसके लिए स्वयं से प्रश्न करने का निरन्तर अभ्यास आवश्यक है।
 महान संत महर्षि  रमण जी के पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन 🙏🪷🪷 स्वर्णअनिल।

शनिवार, 27 दिसंबर 2025

२८ दिसम्बर

पौष की ठंड से कंपकंपाते दिन  
 नभ से नहीं पर हम सबके जीवन से
 जाने क्यों, उषा का उजाला गया छिन
रौशन यादों की अगरबत्तियाँ,
तब से सुलगती रहती हैं रात-दिन !
उनका धुँआ आँखों को समंदर बना,
धुंधला कर लौट आता है---- तेरे बिन !

सोमवार, 24 नवंबर 2025

!! माज़ी के खुलते दरीचे !!

होती है तारीफ़ अहमियत की,
इंसानियत की मगर कद्र होती है।
तरजीह मत दे इंसानियत पर ओहदे को,
बंदे पर ख़ुदा की नज़र होती है।
                  ******** (धर्मेन्द्र जी।)

  जीवन की भागदौड़ में ,अपना सबकुछ पीछे छूट जाता है। पत्नी-माता-कार्यक्षेत्र के दायित्व निभाने में 'अपनाआप' कहीं किसी बंद अटैची में रखे पुराने चित्रों सा दबा रह जाता है। - - - - 
इंद्रधनुषी समय के वे चलचित्र ,जिन पर हमने सबसे पहला नाम ,बचपन में अनजाने ही "धर्मेंद्र जी" लिख लिया था। कारण था १९६२ का भारतपर थोपा गया चीनी युद्ध।उस युद्ध में सरकारी उदासीनता से उपजी सैनिकों के कष्टों व विभीषिकाओं को हमने हिमाचल प्रदेश के सैनिकों से लगभग ९ वर्ष की आयु में अपने घर आए भाई जी से सुना था और उन स्मृतियों को 
१९६४ में  आई "हकीकत "फिल्म में  जीवन्तता देखा। ---- देश की सीमाओं की सुरक्षा में लद्दाख के असंवेदनशील प्रकृति में देश के लिए प्राण न्यौछावर करते , सौंदर्य और संवेदनशील धर्मेंद्र जी की छवि हमारे बालमन पर गहरी अंकित हो गई। सुरक्षा सेनाओं से जुड़े पिता, चाचा, जीजा, भाई वाले पराजयों के परिवार में वर्दी के लिए आत्मीयता ने इसे और बढ़ाया।  
इसके बाद विद्यालय से (वर्तमान -बुद्ध जयंती पार्क)बुद्धा गार्डन पिकनिक पर गए तो एयरफ़ोर्स की वर्दी में नीला आकाश (१९६५) की शूटिंग करते धर्मेंद्र जी को निकट से देखा-सुना तो - - - - वे हमारे मनपसंद "हीरो" हो गए। उसके बाद किसी भी पत्र-पत्रिका मे छपे धर्मेंद्रजी के चित्र इकट्ठे करना हमारी अभिरुचि बन गया था -- - - हमारी नीचे रंग कीअटैची ,जो हमें विद्यालय की स्क्रैप-फाईलों के लिए फूल- पत्तों व आवश्यक सामग्री रखने के लिए दी गई थी वो केवल 'हमारे हीरो' के चित्रों से भर गई थी। घर-बाहर सब जानते थे। आज भी याद आता है कि 'अनुपमा' के लिए हुए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पिताजी को जाते देख , हमारे भीतर पिए गए मौन आँसुओं को पिताजी नें समझा और हमें भी समारोह में साथ ले गए थे। 
फूल और पत्थर, सत्यकाम, आदमी और इंसान  - - - - आदि परिवार के साथ देखी। लेडी श्रीराम कॉलेज में पड़ते समय घर पर आई एक सहेली नें हंसते हुए माँ से कहा कि " अम्मा इसे गुड्डी ज़रूर दिखाना इस पर ही बनी है। " - - - - सच में उस वक्त बहुत हैरानी हुई थी कि हमारी बातें फ़िल्म वालों को कैसे पता चली !! ढेरों यादें हैं !! 
१ नवंबर २०२५को अस्पताल में भर्ती होने पर लगा कि ८ दिसंबर को अपना जन्मदिन अवश्य मनाऐंगे - - - - १२को लौटे तो आस बंध गई थी- - - - पर - - - - २४ नवंबर को ---- सब समाप्त हो गया।  अपनी कला और व्यक्तित्व के गुणों से जनसाधारण के सर्वप्रिय अभिनेता, लोकसभा सांसद के रूप में राष्ट्र सेवक और फिल्म अभिनेता, निर्देशक, निर्माता के रूप जनमाना में अपनी विशिष्टताओं का लोहा मनाने वाले सुन्दर. सौम्य, संवेदनशील धर्मेंद्रजी को, अशेष श्रद्धांजलि एवं कोटिश नमन....🖊



रविवार, 20 जुलाई 2025

गढ़मुक्तेश्वर : मुक्ति की विरासत सहेजे पावन धाम !!

🔱काशी से लौटते हुए गढ़ गंगा जी के दर्शन हुए तो शिवपुराण में वर्णित, गंगाजी के तट पर बसे विश्वेश्वर के प्रिय धाम गढ़मुक्तेश्वर को, रेलगाड़ी से ही नमन किया। पुराणों में *शिव वल्लभ * नाम से वर्णित इस पावन तीर्थ की महिमा काशी से भी अधिक मानी गई है - - - -  
"काश्यां मरणात्मुक्ति: मुक्ति: मुक्तीश्वर दर्शनात्।।" 
भागवत पुराण और महाभारत के अनुसार यह क्षेत्र कुरु की राजधानी का भाग था।
शिवपुराण के अनुसार - " गणानां मुक्तिदानेन गणमुक्तिश्वरः स्मृतः" इससे जुड़ी कथा के अनुसार - - - - एक बार मंदराचल पर्वत की गुफा में ब्रह्मर्षि दुर्वासा तपस्या में निमग्न थे। भगवान शंकर के गण  घूमते हुए वहां पहुंचे। गणों नें तपस्यारत ब्रह्मर्षि का उपहास किया। ऋषि से पिशाच होने का श्राप मिला तो शिवगण चरणों में गिर पड़े। उनका अपराध क्षमा कर दुर्वासा ऋषि नें हस्तिनापुर के समीप खांडव वन में स्थित शिववल्लभ क्षेत्र में तपस्या कर भगवान आशुतोष की कृपा प्राप्त कर पिशाच योनि से मुक्ति का उपाय बताया।  पिशाच बने शिवगणों ने शिववल्लभ क्षेत्र में आकर कार्तिक पूर्णिमा तक तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन उन्हें दर्शन दिएऔर पिशाच योनि से मुक्त कर दिया। तब से शिववल्लभ क्षेत्र का नाम 'गणमुक्तिश्वर' पड़ गया। बाद में 'गणमुक्तिश्वर' का अपभ्रंश 'गढ़मुक्तेश्वर' हो गया। गणमुक्तिश्वर का प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर आज भी इस कथा का साक्षी है। 
मान्यता है कि 'मुक्तिश्वर महादेव' के सामने पितरों को पिंडदान और तर्पण करने से गया श्राद्ध करने कीआवश्यकता नहीं रहती। पांडवों ने महाभारत के युद्ध में मारे गये असंख्य वीरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान यहीं मुक्तिश्वरनाथ के मंदिर के परिसर में किया था। यहां कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को पितरों की शांति के लिए दीपदान करने की परम्परा भी रही है। पांडवों ने भी अपने पितरों की शांति के लिए मंदिर के समीप गंगा में दीपदान किया था तथा कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर पूर्णिमा तक यज्ञ किया था। तभी से यहां कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगना प्रारंभ हुआ। कार्तिक पूर्णिमा को भारत के अनेक नगरों में मेलों का आयोजन होता है किन्तु गढ़मुक्तेश्वर का मेला उत्तर भारत का सबसे बड़ा मेला माना जाता है।
जिसके दर्शन मात्र से मुक्ति प्राप्त होती है उस स्थान की ऊर्जा सर्वत्र सकारात्मक्ता लाए और शिव का प्रिय श्रावण मंगलमय हो।।🙏🌷🌷🌷🌷स्वर्ण अनिल ।

बुधवार, 16 जुलाई 2025

🇮🇳 मेघालय के अप्रतिम स्वातंत्र्य वीर ☀️यू तिरोत सिंग जी के जन्मदिवस ☀️ पर कृतज्ञतापूर्ण श्रद्धासुमन 🙏





१७ जुलाई का पावन दिन मेघालय में "यू तिरोत सिंग दिवस" के रूप में पूर्णश्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है। 
यू तिरोत सिंग सीयम १८०० के दशक के आरंभ में खासी लोगों के प्रमुख थे।वर्ष १८२६ में, अंग्रेजों ने ब्रह्मपुत्र घाटी पर अधिकार कर लिया।खासी पहाड़ियों को पार करने के लिए अंग्रेज एक सड़क बनाना चाहते थे ताकि घाटी को सूरमा घाटी से जोड़ा जा सके, जिस पर वे अपना अधिकार कर चुके थे। अंग्रेजों का प्रतिनिधित्व कर रहे डेविड स्कॉट ने सड़क निर्माण की अनुमति के लिए खासी सरदार तिरोत सिंग से संपर्क किया और उन्हें सड़क मार्ग से बेरोकटोक व्यापार का वचन दिया। यू तिरोत सिंग को षडयंत्रकारी अंग्रेजों के वास्तविक इरादों पर शक था। यह जानकर वे परेशान हो गए किअंग्रेज उनके क्षेत्र में अपनी फौजी टुकड़ियाँ बढ़ा रहे हैं। यू तिरोत सिंग ने तब अंग्रेजों को क्षेत्र छोड़ने का आदेश जारी किया, जिसे उन्होंने  नज़र अंदाज़ कर दिया।
तिरोत सिंह ने खासी पहाड़ियों से अंग्रेजों को खदेड़ने का दृढ़ निश्चय किया और अप्रैल १८२९ में उनके सैकड़ों सैनिकों ने एक ब्रिटिश चौकी पर हमला कर दिया। चार वर्ष तक चलने वाला 'आंग्ल- खासी युद्ध' छिड़ गया। खासी सैनिकों के पास यद्यपि ना तो पर्याप्त अस्त्र - शस्त्र थे और ना ही उनकी संख्या, तुलनात्मक दृष्टि से भी अधिक थी, फिर भी तिरोत सिंग और उनके सैनिकों ने चार वर्षों तक अपना जो अदम्य साहस और अप्रतिम वीरता दिखाई, वह अद्भुत है। अंततः तिरोत सिंग को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया ढाका भेज दिया गया। वहाँ १७ जुलाई, १८३५ को इस अद्वितीय स्वातंत्र्य वीर नें वीरगति पाई। 
हर वर्ष उनकी शहीद दिवस पर मैरांग स्थित यू तिरोत सिंग स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत है। 🙏स्वर्णअनिल

रविवार, 13 जुलाई 2025

🌧️श्रावण मास में - - - - 🌧️

विश्वेश्वर सारंगनाथ मन्दिर


🔱वैदिक काल से भी पूर्व जिस काशी की उपस्थिति को ऋग्वेद में अंकित है। इस अविमुक्त क्षेत्र काशी में ,भगवान् शिव के स्वरूप के अनेक विग्रह हैं। इनमें एक है - "सारंगनाथ मंदिर"। सारंगनाथ के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम "सारनाथ" पड़ा ऐसी लोक मान्यता है।बेशक आज सारनाथ भगवान बुद्ध की प्रथम उपदेश स्थली के रूप में विख्यात है परन्तु उनसे यहां का दिगम्बर जैन मंदिर एवं सारंगनाथ शिव मंदिर भी जनसामान्य में प्रतिष्ठित है।
श्रावण मास में एक बार सारंगनाथ जी के दर्शन से काशी विश्वनाथ जी के दर्शनों के बराबर पुण्य फल प्राप्ति होती है,भक्तजनों  का ऐसा दृढ़ विश्वास है।
मंदिर में दर्शन करने से पूर्व,भक्तजन मंदिर के सामने बने सारंगनाथ सरोवर से आत्मशुद्धि करते हैं और फिर जल लेकर ४४ सीढ़ियां चढ़कर पावन शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं।पुराणों में इस क्षेत्र को ऋषिपत्तन मृगदाव कहते थे।
मंदिर के इतिहास के बारे में कई लौकिक कथाएँ प्रचलित हैं। कहते हैं कि जब राजा हिमाचल ने अपनी पुत्री उमा का विवाह शिव से किया तो उस समय उनके भाई सारंग ऋषि वहां उपस्थित नहीं थे। वे तपस्या के लिए अन्यत्र गए हुए थे। तपस्या के बाद जब सारंग ऋषि अपने घर पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनके पिता ने उनकी बहन का विवाह कैलाश पर रहने वाले औघड़ शिव से कर दिया है। सांसारिक सुखों से असम्पृक्त वर से बहन के विवाह की बात सुनकर वे दुःखी हुए। सारंग ऋषि अपनी राजसुख में पली बहन की दशा की कल्पना कर विचलित हो गए।उन्होंने ध्यान द्वारा जाना कि काशी में उनकी बहन पार्वती पति के साथ विचरण कर रही है। सारंग ऋषि धन-सम्पदा का भंडार लेकर, अपनी बहन से मिलने हिमालय से काशी के लिए चल पड़े।मार्ग में, ऋषिपत्तन में (जहां आज मंदिर है) वे विश्राम के लिए ठहर गए। थकावट के कारण वे सो गए।उन्होंने स्वप्न में देखा कि काशीनगरी एक वैभव सम्पन्न स्वर्णनगरी है। नींद खुलने के बाद वहां के लोगों से विश्वनाथ व पार्वती की यशोगाथा सुन, उन्हें बहुत ग्लानि हुई कि उन्होंने अपने बहनोई के बारे में कैसी अनर्गल कल्पनाएं की थी। उसी क्षण उन्होंने प्रण किया कि प्रायश्चित स्वरूप अब वो विश्वनाथजी की तपस्या करेंगे,उसके बाद ही वो अपनी बहन से मिलेंगे। ऋषिपत्तन को उन्होंने अपनी साधना स्थली बनाकर, बाबा विश्वनाथ की तपस्या की। जनश्रुति के अनुसार तपस्या करते-करते उनके पूरे शरीर पर फफोले निकलने लगे। वहां के पेड़ों नें अपनी गोंद टपका कर उन्हें शीतलता दी।अंत में उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर विश्वेश्वर ने पार्वती सहित उन्हें दर्शन दिए। बाबा विश्वनाथ नें जब सारंग ऋषि से इस जगह से काशी चलने को कहा तो उन्होंने कहा कि अब हम यहां से नहीं जाना चाहते,हमारे भ्रम का निवारण कर,सत्य का दर्शन करवाने वाला, आपके सच्चिदानंद स्वरुप का सानिध्य प्रदान करने वाला यह स्थल सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ स्थान है।भाई के स्नेह से अभिभूत पार्वती जी नें काशीधिपति विश्वनाथ से कुछ समय वहां ठहरने का आग्रह किया।
भगवान् आशुतोष नें पार्वती की इच्छा को सहर्ष स्वीकार किया और ऋषि सारंग को आशीर्वाद देते हुए कहा कि भविष्य में यह  स्थान "सारंगनाथ" के नाम से जाना जाएगा और कलयुग में जो चर्मरोगी सच्चे मन से तुम्हे गोंद चढ़ाएगा उसे चर्म रोग से मुक्ति मिल जाएगी।
लोक मान्यता कहती है कि सारंग ऋषि की तपस्थली का नाम उसी दिन से "सारंगनाथ" पड़ा। उनकी भक्ति देख प्रसन्न हुए बाबा विश्वनाथ स्वयं भी यहां सोमनाथ के रूप में विराजमान हुए।भोले भण्डारी अब भी श्रावण माह में पत्नी सहित वहां आकर निवास करते हैं।
वर्तमान में, श्रावण मास उमा-माहेश्वर के भक्तजनों के,*ॐ नमःपार्वतीपतये हर-हर महादेव * के जयकारों से इस मंदिर का सम्पूर्ण वातावरण गुंजायमान रहता है।
लोक-आस्था इस मंदिर को "जीजा-साले का भी मंदिर" कहकर पुकारती है।श्रद्धालु इस शिव मंदिर को भगवान् भोलेनाथ की दूसरी ससुराल मानते हैं।  
ऋषि की तपस्या, भक्त की द्वन्द्वात्मकता के परिशमन से अलौकिक आनन्द की यात्रा, भाई-बहन के मधुर सम्बन्धों की संवेदनशीलता और बाबा विश्वनाथ के आशुतोष स्वरूप का दर्शन करवाने वाला यह "सारंग नाथ महादेव मंदिर"अप्रतिम तीर्थ है।🙏 🔱स्वर्ण अनिल।🪷🪷🪷

मंगलवार, 8 जुलाई 2025

!! अप्रतिम लोकटक झील !!

पूर्वोत्तर भारत के अविस्मरणीय प्राकृतिक परिदृश्यों में मणिपुर के विष्णुपुर ज़िले में *लोकटक झील * है। इम्फाल शहर से ४८ किलोमीटर दूरी पर स्थित यह मनमोहक झील उत्तर-पूर्व भारत की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील है।जल का यह सुंदर विस्तार, छोटे अंतर्देशीय समुद्र जैसा दिखाई देता है। लोकटक झील पर बिताया हुआ समय हमारे लिए जीवन भर की अमूल्य निधि बन गया है। लोकटक झील को भूगर्भीय हलचलों के कारण बनी ; विवर्तनिक झील (टैटोनिक) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जो तैरते हुए वृत्ताकार द्वीपों से सजी हुई है। 
तैरती फुमदियों के कारण (विभिन्न अपघटन अवस्थाओं में वनस्पति, मिट्टी और कार्बनिक पदार्थों का विषम द्रव्यमान) इसे दुनिया की एकमात्र तैरती झील भी कहा जाता है। 
भूविज्ञान और भूगोल के प्राकृतिक सौंदर्य का स्रोत का यह मनोहारी स्थान, विभिन्न प्रकार के पौधों की प्रजातियों व वन्यजीवों, पक्षियों एवं जलजीवों के लिए आवास भी प्रदान करता है।
मणिपुर की यह झील अपने अनूठे पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता, और सांस्कृतिक महत्व के लिए विख्यात है। 
लोकटक झील के तैरते हुए द्वीप जिन्हें "फुमडी" कहा जाता है। ये फुमडी वनस्पति, मिट्टी और कार्बनिक पदार्थों का मिश्रण हैं जो झील की सतह पर सदा तैरते रहते हैं। 
लोकटक झील में दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान, केइबुल लामजाओ राष्ट्रीय उद्यान है। यह उद्यान "संगाई हिरण" का प्राकृतिक आवास है।यह"नाचता हिरण" मणिपुर का राज्य पशु भी है। 
मीठे पानी से भरी "लोकटक झील" मणिपुर के लिए एक महत्वपूर्ण जलस्रोत है, जिसका उपयोग सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है। यह झील स्थानीय लोगों के जीवन, संस्कृति और आजीविका का एक अभिन्न अंग है।
प्राकृतिक सौंदर्य एवं तैरते हुए द्वीपों के आश्चर्यों से अभिभूत करती *लोकटक झील* अपनी अनूठी फुमडी, तैरते हुए राष्ट्रीय उद्यान, जैव विविधता, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्व के कारण पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। 

शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

मंगलवार, 24 जून 2025

श्रीशैलम का उमा-महेश्वर मंदिर।


🪷
🔱वर्ष २०२१ में जब हम श्रीशैलम के दर्शन के लिए गए तब महाशिवरात्रि का महापर्व ११ मार्च को था। हिमाचल प्रदेश की पुत्री होने  के कारण, शिव-शक्ति की पूजा-अर्चना बचपन से हमारे संस्कारों व आस्था का अभिन्न अंग रहा है। हिमाचल प्रदेश में शिवरात्रि सबसे बड़ा उत्सव है
वहां महीने भर पहले से शिव - पार्वती विवाह की शुरुआत हो जाती है और आंचड़ियों (पारंपरिक भक्ति गीत) की ध्वनि वातावरण को दिव्यता से भर जाता है। हैदराबाद से कार से श्रीशैलम जाते हुए १ मार्च को मार्ग में पीले वस्त्रों में 
शिवभक्तों को शिवनाम जपते हुए नंगे पांव श्रीशैलम की ओर बढ़ते देख कर हमें सुखद आश्चर्य हुआ। हमनें जाना कि यहां११ दिवसीय ब्रह्मोत्सवम मनाया जाता है। 
हम श्रीमल्लिकार्जुनम् ज्योतिर्लिंग व अक्क महादेवी जी की साधना गुफा के दर्शन हेतु उत्सुक थे। हमारे प्रश्नों व जिज्ञासाओं का उत्तर देते हुए ड्राइवर भय्या नें मार्ग में मसिगंडी, स्थानीय कुलदेवी तथा श्रीशैलम के उत्तर द्वार उमा-महेश्वरम् मंदिर के दर्शन का आग्रह जिस आत्मीयता से किया उसके कारण हम इसे स्वीकार करने को बाध्य थे। समस्त मार्ग पर, भक्तों की  मंडलियों के साथ मिलता रहा। 
महाशिवरात्रि के अवसर पर 
श्रीशैलम भगवान शिव और देवी पार्वती जी के विवाह समारोह के उल्लास से आनंद से परिपूर्ण था। 
श्रीशैलम सबसे प्रमुख क्षेत्रों में से एक है जहां भगवान शिव और पार्वती देवी ने भगवान मल्लिकार्जुन एवं भ्रमरांबिका देवी के रूप में अवतार लिया था। मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग मंदिर के लिए प्रसिद्ध  और हिंदुधर्म के शैव और शक्ति संप्रदायों के लिए पवित्र तीर्थ स्थलों में से एक है।
 🔱उमा महेश्वर मंदिर , जिसे महेश्वर स्वामी के नाम से भी जाना जाता है, भारत के तेलंगाना में भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर , सुरम्य नल्लमाला वन श्रृंखलाओं में स्थित है। हैदराबाद से लगभग १००किलोमीटर दूर हैदराबाद -श्रीशैलम राजमार्ग पर स्थित उमामहेश्वरम तीर्थम् को पावन श्रीशैलम का उत्तरी प्रवेशद्वार कहा जाता है। विश्वविख्यात द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से इसे एक स्वयम्भू माना जाता है। इस पवित्र स्थान का उल्लेख भारत के वैदिक ग्रंथों, पुराणों, शास्त्रों में मिलता है। ऐसी मान्यता है कि त्रेतायुग में श्रीराम जी नें श्रीशैलम में उमामहेश्वरम के दर्शन
किए थे।वर्तमान समय में भी  उमा-महेश्वर स्वामी के दर्शन के बिना श्रीशैलम की यात्रा अधूरी रहती है।
पहाड़ी के ऊपर चारों तरफ से विशाल पेड़ों से घिरे हुए इस मंदिर का सौंदर्य अलौकिक शांति देता है। दूर तक फैली पहाड़ों की श्रृंखलाएं मंदिर की पृष्ठभूमि का निर्माण करती हैं।
ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में देवता प्राकृतिक रूप से बनी गुफा में स्थित हैं। इस मनभावन मंदिर पर पहाड़ियों से लगातार बहता पानी ऐसा आभास देता है मानो देवी गंगा यहाँ अपना पावन अँचल  से भक्तों को आश्रय दे रही हैं। 
यहां "पापनाशनम् कुंड" में, 
विशाल चट्टानों के नीचे से पानी निकलता रहता है।
विशाल चट्टानों के नीचे पूरे साल एक ही गति से पानी बहता रहता है। इस पानी को बहुत पवित्र माना जाता है। इसका आचमन आध्यात्मिक रूप से एक अप्रतिम अनुभव देने वाला है। 
उमामहेश्वर स्वामी मंदिर के निर्माण का इतिहास इसे दूसरी शताब्दी में चंद्रगुप्त मौर्य के शासन काल से जोड़ता है।
मैंने इस मंदिर की अलौकिक ऊर्जा का ऐसा अनुभव प्राप्त किया है जो उस समय मेरी आँखों से निरन्तर जलधारा के रूप में बहकर मेरे तन-मन को भिगो गई थी।उसअप्रतिम अविस्मरणीय क्षण में, मैं निशब्द जड़वत खड़ी थी और मंदिर के प्रधान पुजारी नें स्वयं आकर मेरे शीश पर ईश्वर का आशीर्वाद रखा।उनके "माँ प्रसादम्" शब्दों से हमारी तंद्रा टूटी पर अश्रुधारा नहीं रुकी। अपनी अद्भुत, अनिर्वचनीय अनुभूतियों को, शब्दों में बांधना हमारे लिए सम्भव नहीं है।बहुत देर तक पुजारी जी के कहने पर हम वहीं बैठे रहे। उसी आनंद से सराबोर हमनें "पापनाशनम् कुण्ड" के जल के सानिध्य को आत्मसात किया। - - - - संत पल्टू जी नें कहा ''पीउ को खोजन मैं गई, आपहु गई हिराय'' स्थिति ऐसी ही थी - - मगर मैं तो खोजने गई ही नहीं थी, फिर भी खुद खो गई !!!! - - - - नंगे पाँव ही लौट आई थी और पता भी नहीं चला----चेताया गया तो जाना !! 
अपने आराध्य की पावन ऊर्जा की स्मृतियाँ हमें आज भी भावविह्वल कर देती हैं। 
इस मंदिर में असंख्य भक्त अपनी मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए इस स्थान पर आते हैं और आनंददायी अनुभूतियों को अपने साथ ले जाते हैं। 

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2025

रामेश्वरम् के पंचमुखी हनुमान जी ।

दक्षिण भारत में, अप्रतिम सांस्कृतिक वैभव को सहेजे शंख की आकृति वाले, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरे इस द्वीप "रामेश्वरम" की यह शंखाकार आकृति इसके धार्मिक और भौगोलिक महत्व का एक प्रमुख हिस्सा है।इसी  रामेश्वरम में एक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है- हनुमान तीर्थम  !  रामनाथपुरम में खुले में स्थापित पंचमुखी हनुमान जी की प्रतिमा मंदिर परिसर में स्थित है, ।  पांच मुख वाले अनूठे विग्रह में बीच में हनुमान जी का चेहरा है और अन्य चेहरे भगवान नरसिंह, आदिवराह, गरुड़ और हयग्रीव के हैं।
मंदिर के अंदर वे प्रसिद्ध "तैरते हुए पत्थर" भी रखे गए हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि रामायण काल में भगवान राम की वानर सेना ने राम सेतु बनाने के लिए इनका उपयोग किया था।
*पंचमुखी हनुमान जी* से सम्बन्धित आख्यान के अनुसार, लंकापति रावण के सभी योद्धा युद्धक्षेत्र में श्रीराम-लक्ष्मण के सम्मुख पराजित हो रहे थे।उस समय रावण ने अपने भाई अहिरावण से सहायता मांगी जो पाताल लोक का राजा और तंत्र-मंत्र एवं मायावी विद्या में प्रवीण था। अहिरावण ने अपनी माया से विभीषण का रूप धारण किया और रात्रि में सोए हुए श्रीराम-लक्ष्मण को पाताल लोक ले जाकर बंदी बना लिया।विभीषण नेअहिरावण द्वारा श्रीराम-लक्ष्मण को बलि दिए जाने की आशंका जताते हुए हनुमान जी को शीघ्र पातालपुरी प्रस्थान का आग्रह किया। वहां हनुमान जी का सामना अपने पुत्र मकरध्वज से हुआ।(पौराणिक संदर्भ के अनुसार लंकादहन के बाद अपनी पूंछ की आग बुझाने हनुमान जी समुद्र में कूदे तो मकरी नें उनके पसीने को निगला। मकरीपुत्र-मकरध्वज हनुमान पुत्र कहलाया) अहिरावण ने पातालपुरी में अपनी रक्षा के लिए पाँच दिशाओं में पाँच दीपक जलाए थे। उसे वरदान प्राप्त था कि पांचों दीपक एकसाथ बुझाने पर उसकी शक्तियां समाप्त हो जाएंगी। हनुमान जी ने इन दीपकों को एक साथ बुझाने के लिए पंचमुखी रूप धारण किया और पांचों दीप एक साथ बुझा कर, मायावी शक्तियों से हीन अहिरावण का वध कर भगवान राम और लक्ष्मण को उस के चंगुल से मुक्त किया। रामेश्वरम्  के पंचमुखी हनुमान जी का यह अद्वितीय विग्रह अहिरावण द्वारा अपहृत किए गए श्रीराम- लक्ष्मण की मुक्ति से जोड़ कर ---- रुद्रावतार हनुमानजी के पराक्रम, रामभक्ति और अटूट निष्ठा की दिव्य अनुभूति का संचार दर्शकों में अनायास ही करती है !!

शुक्रवार, 7 मार्च 2025

#अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस


#अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 🌺
मैं मानती हूं कि महिला दिवस के 'आयातित तथाकथित विमर्शों ' का  भारतीय संदर्भ में विचार करते समय, हमें भारत की सामूहिक चेतना पर भी विचार करना होगा जो हमारे उस मनोवैज्ञानिक इतिहास को बनाती है जिसकी जड़ें, जाने- अनजाने चिरंतन शक्ति के रूप में हम सब में प्रतिष्ठित रहती हैं। हमारी सामूहिक चिति अपने आदि पुरुष के रूप में स्वयंभू मनु और आदि नारी के रूप में शतरूपा को स्वीकारती आई है।प्रजापत्य कल्प के "स्वयंभु मनु और शतरूपा " ही मानव संतति के आदि- जनक और आदि-जननी कहलाते हैं। स्वयंभु मनु एवं शतरूपा नें सहस्त्रों वर्षों तक तपस्या की और फिर ईश्वर के निर्देश पर उस मैथुनी सृष्टि को जन्म दिया जिसकी परंपरा में हम सब मानव कहलाए। अपने पुत्र-पुत्रियों को जन्म देने के बाद, उनको सामाजिक व राष्ट्रीय दायित्व वहन करने की कुशलता देने के बाद, वे दोनों पुनः तपस्या में तल्लीन हो गए । हमारे आदिजनक
 मनु और आदिजननी शतरूपा दोनों; समान  दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक योग्यताओं से परिपूर्ण थे। वे समान धरातल पर प्रतिष्ठित ऐसे युगल हैं जिनको वेदज्ञान (ब्रह्म) के ज्ञाता (ब्रह्मा)होने के कारण ठीक वैसे ही ब्रह्मा की साकार रचना माना गया जैसे हम आज तक विवाह 
 के समय वर-वधु को उमा-शंकर या सीता-राम मानते आ रहे हैं। 
आज का संचार क्रांति के युग में हमारी जागृत नई पीढ़ी, भारत पर हुए सांस्कृतिक आक्रमणों, उपनिवेशवाद की जातिगत हीनता के प्रचारित षडयंत्रों का सत्य जान चुका है !! इसीलिए विश्व वेदों की वैज्ञानिक स्वरूप को स्वीकार रहा है।ज्ञान-विज्ञान की नई खोजों नें वेदों में वर्णित कई सत्यों को प्रमाणित किया है।
विस्तार में ना जाकर मैं इतना ही कहूंगी "संस्कृत" की 'मह्' धातु से बने शब्द 'महिला' को लेना चाहिए जिसमें वैदिक  युग की छाया स्पष्ट दिखाई देती है। तब देश में ऐसी सामाजिक व्यवस्था थी कि सम्मान, आदर, महत्ता,श्रद्धा और महत्वपूर्ण - - - - जैसे भाव महिलाओं से स्वतः ही जुड़े हुए थे। भारतीय परिप्रेक्ष्य में "महिला" की बात करते हुए मेरा मन सदा भारतीय अतीत के उस राजमार्ग पर जाकर खड़ा हो जाता है जहाँ हर मील के पत्थर पर स्वर्णाक्षरों में कई महिलाओं के नाम लिखे दिखाई देते हैं।आज के समय में भी कई बुद्धिजीवियों द्वारा,भारतीय महिलाओं की स्थिति को लेकर, सत्य जाने बिना भारतीय संस्कृति पर ही दोषारोपण किया जाता है। भारतीय संस्कृति में नारी शक्ति को दिव्य एवं श्रेष्ठ माना गया है यही कारण है कि भारतीय आदिग्रंथ ऋग्वेद , 'आप: मातरम्' से शुरू होता है। सरस्वती माता,गंगामाता,भारतमाता धरतीमाता जैसे शब्द सम्पूर्ण विश्व में केवल यहीं प्रयोग में आते हैं। वैदिक काल से यहां देवी की उपासना हुई है। अपनी  सांस्कृतिक परंपरा में महिला संबंधी सत्य को जानने के लिए यदि हम केवल वैदिक काल के 'ऋग्वेद' को ही देखें तो उसमें २६ ऋषिकाओं द्वारा रचित ऋचाएं हैं। - - - - और ऋषिका सूर्यासावित्री द्वारा रचित विवाह मन्त्रों को हम वैदिक काल से वर्तमान तक विवाह संस्कार के समय पढ़ते आ रहे हैं। वर-वधु  विवाह के समय सप्तऋषि मंडल के  वशिष्ठ-अरुंधती (पति-पत्नी) को देखकर दाम्पत्य जीवन में सफलता का आशीर्वाद पाते हैं - - - - इस सफलता का आधार इस वैज्ञानिक सत्य पर टिका है कि आकाश में ये दोनों एक दूसरे के आगे-पीछे नहीं साथ-साथ चलते हैं।---- जहाँ समानता है वहाँ सम्मान भाव स्वयं विद्यमान है। मैंने भारतीय संस्कृति के महिला विषयक केवल एक पक्ष का संक्षिप्त उदाहरण देकर भारतीय महिला दिवस के वैशिष्ट्य को सामने लाने का प्रयास इस आशा के साथ किया है  कि (३० मार्च २०२५) चैत्र मास से प्रारम्भ होने वाले भारतीय नववर्ष (विक्रमी संवत)जिसका  शुभारम्भ हम, वासंतिक नवरात्रि के शैलपुत्री पूजन से कर उनके सिद्धिदात्री स्वरूप से करते हैं - - - - उस समय
 यदि हमारी युवा पीढ़ी संगठित होकर अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं के सुन्दर,अनुकरणीय विचारों को युगानुकूल बना कर अपनाने का संकल्प लें तो एक दिन महिला दिवस मनाने की जगह, समाज का व्यवहार भारतीय मूल्यों की समरसता को पा लेगा - हार्दिक शुभेच्छाओं सहित यही कहूंगी - - - -
 महिला दिवस /भारतीय  संदर्भ । 📖🖊️ 
अर्द्धनारीश्वर का समता दर्शाता भारतीय स्वरूप, 
शक्ति और शिव की जागृत ऊर्जा भरा रूप अनूप, 
 जब दशभुजी अम्बा कहलाती अनादि ब्रह्मरूप, 
तब हर नारी कहलाएगी उसी का प्रारूप, 
जन-जन में समादृत होगा जब यही सनातन रूप, 
तभी फैलेगी सर्वत्र शाश्वत चेतना की स्वर्णिम धूप !! 
🌺🌺🌺🌺🌺   स्वर्णअनिल।

बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

१६ अक्तूबर की ठहरी हुई साँझ !!

🌷कलाऋषि अमीरचंद भाईजी की अमिट स्मृतियों को अश्रुपूरित श्रद्धासुमन 🌷🙏
१६ अक्तूबर   !!!! 
समय की सारी तेज़ रफ़्तार इस दिन ठहर जाती है ! हम अरुणाचल के युद्ध स्मारक, न्युकमादोंग पहुंच कर देखते हैं---- १९६२ के वीर योद्धाओं को समर्पित युद्ध स्मारक में श्रद्धेय अमीरचंद भाई जी परंपरागत श्रद्धाँजलि पूजन कर रहे हैं ।  भावविह्वल से हम और भाई जी ६माह पहले स्वर्गगामी आदरणीय बिमल भाई जी एवं "सरहद को स्वरांजलि" कार्यक्रम को याद कर रहे हैं - - - - फिर सारे शब्द खो गए और कानों में गूंजते हैं बस वही शब्द - "मुझे ऐसा लग रहा है जैसे नवंबर २०१३ को इटानगर में हुए स्वरांजलि के कार्यक्रम की पूर्णाहुति आज की श्रद्धाँजलि पूजा से पूरी हुई है। स्वर्ण जी, मन की बात बताऊं! मुझे आज पूर्ण तृप्ति का आनंद अनुभव हो रहा है। "
इस पूर्ण तृप्ति के आनंद को सहेज कर पापांकुशा एकादशी की संध्या को जो मौनव्रत भाईजी नें धारण किया उसे ना तो हम आँखों के सामने सब होता देख कर स्वीकार पाए थे ना ही अब स्वीकार कर पा रहे हैं। आज शरद पूर्णिमा है बार-बार लग रहा है कि फ़ोन आएगा और
भाईजी कहेंगे " आप तो खीर बनाएंगी पर हम दिल्ली में नहीं हैं।" जवाब में हम अपनी भीगी आँखें लिए मन में दोहरा रहे हैं -अपनी शुगर का ध्यान रखिए भाईजी। 
सच में, आपको डांटने की आदत का क्या करें ? महर्षि वाल्मीकि, कुल्लू दशहरा, कोजागरी पर बातचीत, चर्चा - - - -  सब पर मौन ही छा गया है। भाईजी आप तो भूल गए पर हमें बहुत याद आते हैं। एक गहरा शून्य सा घिर आया है - - - -